Thursday, August 21, 2014

वह तोड़ती नहीं पत्थर वह पत्थर की तरह तोड़ दी जाती है

वह तोड़ती नहीं पत्थर वह पत्थर की तरह तोड़ दी जाती है =======================================
 हम कभी अपनी चाहना से आजाद होंगे
 हम सदा कुछ न कुछ चाहते रहेंगे
कि करते रहें हम कोई न कोई काज
भूख रोटी अलग बात
कि हम चाहते हैं कि हम समाज के लिए दे सकें अपने बूते का योगदान
 कम से कम अपनी काबलियत भर का तो चाहते हैं
 क्यूंकि हम में से हर कोई पूरी तरह नलायक नहीं होता है
कि सब में कुछ न कुछ लायक बना बचा होता है
फिर उस पैमाइश में हमें क्यूँ नहीं मिलता ठिकाना
जिसकी काबिलयत का हमें भरोसा होता है
क्यों हम में से कुछों के भाग्य में
 दर दर की ठोकर खाना
 ठोकर पर उनका होना पाना लिखा होता है ......
जानते हो
कुछ लोग शैतानीतंत्र के निशाने पे बींध लिए जाते है
तब अजगर साजिशों का मुंह फाड़ कर उन्हें निगलता ऐंठने लगता है.......
भला एक स्त्री का एक स्त्री से कितना अलग होगा अभिव्यक्त करना  दर्द अपना
मसलन वह तोडती पत्थर ध्याड़ी पर
और वह जो ऊँची शिक्षा के साथ भी
अपने कार्य में दक्ष होने के बाद भी
बेरोजगारी से त्रस्त
शासन के अधीन एक कच्ची नौकरी करती है ...................
क्या फरक
उसकी तठस्थ मेहनत का
ईमानदारी कर्मठता और विद्वता का
दिन रात जिसकी योग्यता का सिर्फ और सिर्फ होता है शोषण ...........
हाँ और एक बात देखी है
किसी टीम के औचक निरिक्षण पर होता है जो उपलब्ध
अपनी कुर्सी पर कार्यालयों में अनुशासित समयबद्ध
प्रश्नों के कटघरे में उसे ही पहुंचा दिया जाता है
क्यूंकि प्रश्न नामौजूद लोगों से नहीं पूछे जाते
अक्सर नमौजूद लोगों के बारे में पूछा भी जाता नहीं
उत्तर के लिए सवालों का ठींकरा उपस्थित के सर फोड़ दिया जाता है ....
सर्वेक्षण टीम का कार्य पूरा हो जाता है..
उसे दिखाना भी यही होता है
सो अखबारों में दे दी जाती है खबरे
यहाँ का सर्वेक्षण हुआ हुआ वहां का सर्वेक्षण ....
सरकार ने कितने हज़ार गाँवों को फलां माल जरूरत से ऊपर पहुंचाया
 ताकि कुछ वक्त लोगों का गुजारा चल सके
और साथ में एक कार्टून को टेग करके लिख दिया जाता है ...
पर महकमे के फलां आदमी को यह भी ज्ञात न था
( जबकि सच वही आदमी जानता है जिसे बलि का बकरा बनाया जा रहा है) ....
कि सरकार पूरे दावे से जिस कार्य के हो जाने का भरोसा राष्ट्र को दे रही है
 उसी महकमे के एक बन्दे को इस कार्य का रत्ती भर भी ज्ञान नहीं
और औचक निरिक्षण के दौरान उसे पकड़ा गया .....
सपष्टीकरण मांगे जाते है, बेवजह हो हल्ला होता है
मोबाइलों पर सवाल, और कई टीमों का पुनः पुनः आवागमन
की जैसे अपने कर्तव्यों पर तल्लीन हो कर कार्य करने का कोई संगीन जुर्म हो गया हो
दफ्तर में काम करती उस औरत  से  अपने स्थान को नहीं छोडती समय से पहले
वह स्त्री जो अपने महकमे की उन्नति के लिए करती है काम
एकांत में रोती है और मानसिक अवसादों का शिकार होती है|
आदत अनुसार फिर अगली सुबह दिखती है वह
मुस्कुराते हुए अपने काम में झुकी अपनी कुर्सी पर ..........

.......... और कुछ दिन बाद
 एक विज्ञापन अखबार में छपता है
 सुरक्षित नौकरी वाले को फलानी जगह वह नौकरी दे दी गयी है........
ध्याड़ी पर काम करती एक पढी लिखी पर साधारण कर्मठ औरत
जिसने लड़ना नहीं सीखा को
गुमनामी के अंधेरों में धकेलने
और उसकी प्रतिभा और इमानदारी को अपमानित  कर
नौकरी से निकालने में एक मिनट का समय नहीं गंवाती सरकार ...... .......
उधर शासन दावा करता है पढ़े लिखे दक्ष कार्यकौशल कर्मचारियों की कमी है .... चले आओ ..
साक्षात्कार ले रही है .... क्या फिर से एक नए शिकार को? ...
और उधर दफ्तर के समय मियाँ मनसुख लाल
घर में बिस्तर में जमाही लेता फोन लगाते हुए सोच रहा है
 ( राजा बाबू फोन उठाता नहीं
 मालूम नहीं रोज की भाँती आज वह किस टॉकीज में होगा
किस रेस्तरां में होगा)
 कि तभी फोन उठा दिया गया है
 भरभराई आवाज में पूछता है काम कैसा चल रहा है दफ्तर में .. सब ठीक ..
एक घंटे से दफ्तर के बाहर बैठ कर ताश की नयी बाजी लगाता हुआ
झम्पट बाबू पान की पीक थूकते हुए कहता है
 जी साहब! सब ठीक चल रहा है
 आप आराम करें ........
और पत्ते फेंटने लगता है

4 comments:

  1. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (22.08.2014) को "जीवन की सच्चाई " (चर्चा अंक-1713)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है, धन्यबाद।

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  2. वर्तमान समय का यही सच है, जिनके पास क़ाबलियत है
    वह संघर्षरत है -- बहुत सार्थक और सटीक
    प्रभावपूर्ण रचना
    उत्कृष्ट प्रस्तुति
    सादर ----

    आग्रह है- मेरे ब्लॉग में भी सम्मलित हों
    हम बेमतलब क्यों डर रहें हैं ----

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