Thursday, December 15, 2011

न मिलेंगी खुशियाँ - नूतन



kuber

एक दिन कुबेर जी
साधू वेश में
मेरे घर आये|
कुछ दंभ में ऐंठे इतराये |
बोले - सुन
दुनियाँ जहां की दौलत है मुट्ठी में मेरी,
हर ख्वाहिश को मैं पूरी कर दूँगा तेरी|
मैं गर चाहूं तो एक नयी दुनियाँ बसा दूं,
तेरी टूटी झोपड़ी को भी महल बना दूं |
बोल बच्चा तुझे क्या चाहिए ?
मैंने तब उनके कान में
धीमे से बोला,
चंद शब्दों में
अपनी इच्छा का राज खोला |
कुबेर जी सकुचाए घबराये
उल्टे पैर दौड़ते नजर आये |
जानोगे मैंने उनसे क्या माँगा था?
मैंने मांगी थी सच्ची खुशियाँ
और गलती से मांग लिया था 

कि इस दुनियां में मिले एक अदद
स्वार्थहीन सच्चा प्यार
|     

   LONELY GIRL IN OIL


  ….. नूतन .. १५ – १२ – २०११  १६:४६ मं 


आज की दुनियां  में सच्चा प्यार मिलना असम्भव सा है... प्रेमी मन  में स्वार्थ कब बिन दस्तक दिए प्रवेश कर जाता है और प्रेम के रंग में घुल मिल जाता है कि प्रेम और स्वार्थ अलग अलग नहीं दिखाई देते हैं| माँ जिसका प्रेम  अपनी संतान के लिए   इस संसार में सबसे ऊँचा दर्जा रखता है, बिना शर्त प्रेम / Unconditional love होते हुवे भी कहीं ना कहीं बच्चों से अपेक्षा रखता है| ऐसे में निस्वार्थ प्रेम की सुलभता पर यही कहूँगी कि यह अति अति अति ही दुर्लभ है | 
सच्चा सुख तो आपसी प्रेम में निहित है  जिसका मोल धन से नहीं लगाया जा सकता है..धन से भौतिक वस्तुवों को ख़रीदा जा सकता है यह खुशियों का क्षणिक भ्रम तो पैदा कर सकता है पर सच्चा सुख नहीं दी सकता जो रिश्तों में प्रेम भाव में हैं ..भौतिक वस्तुवों की भांति प्रेम वह भी निस्वार्थ प्रेम कभी भी पैसों से नहीं ख़रीदा जा सकता चाहे कुबेर जी ही क्यूं ना खरीदना चाहें .. इसलिए इस कविता में कुबेर जी इस खरीद के लिए उल्टे पैर वापस जाते दिखाई दिए |  
बस एक ही प्रेम है जो निस्वार्थ होता है वो है ईश्वर का प्रेम अपने भक्त के प्रति .. और इस ओर राकेश जी ने ध्यान दिलाया उनका धन्यवाद | और हम "त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव बंधू च सखा त्वमेव, की भावना को अंगीकार करें तो सारी खुशियाँ हमें सुलभ है|
सधन्यवाद - नूतन 

 

Sunday, December 4, 2011

तुम मेरे सच्चे साथी हो --



तुम
बिना कोई शिकायत के चुपचाप
मेरे पास बरसों से आ कर बैठ जाते हो ..
मेरे अन्तरंग समय में
मुझसे बहुत बतियाते हो
तुम मेरे सच्चे साथी हो |

भावनाओं के हर भंवर में
लहरों के उतार चढाव संग
मेरे सुख दुःख के साथ ही
तुम भी बहे  जाते हो|
तुम मेरे सच्चे साथी हो|

छोड़ गए जो तन्हा मुझको
दुःख भरे मेरे तन्हा पल में
मन की ताकत बन जाते हो तुम
तुम मेरे सच्चे साथी हो |

कागज़ की श्वेत चादर पर
सफर में संग उड़े जाते हो
आंशुवो को नीलिमा में ढाल
भावनाओं के महल बनाते हो ..
तुम मेरे सच्चे साथी हो|

जो बात किसी से कह ना पाऊं
वो तुम समझ ही जाते हो
मुझे छोड़  गया निर्मोही
बन उसका तुम विद्रोही
मेरा साथ निभा जाते हो
तुम मेरे सच्चे साथी हो  .. सेवा में – “ मेरी कलम “

४-१२-२०११   १५ :५१

Thursday, November 24, 2011

इज्जत की गठरी–डॉ. नूतन गैरोला


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                             हम सभी  इंसान, सनद रहे मैं यहाँ सिर्फ खालिस  इंसानों की बात कर रही हूँ इंसान के रूप में जो जानवर हो, यह पोस्ट उनके लिए कदाचित नहीं, तो सभी इंसान जीवन की दौड में किसी अनजान मंजिल की ओर भाग रहे हैं| एक मंजिल मिलती है तो दुसरी फिर उठ खड़ी होती है, फिर दौड जारी और यूं जीवन पर्यन्त हम दौड़ते रहते है बिना रुके| कभी मंजिल नहीं मिली इसका गम तो कभी मंजिल मिल गयी, अब जिंदगी का मकसद क्या है, इसका गम  .. लेकिन फिर भी एक नयी  मंजिल मिल जाती है… और भागते धावक की तरह या कछुवे की मानिंद हम मंजिल की ओर बढ़ जाते हैं पर इंसान कहीं भी अकेले नहीं होते  .. होती है उसके साथ उसके सर पर रखी इज्जत की पोटली या गठरी  ..जिसे आजन्म वह सर से उतार नहीं सकता..कोई गठरी की ओर ऊँगली उठा कर तो दिखाए वह मार देगा या मर जाएगा क्यूंकि उसने तो इज्जत पर मरना और मारना ही सीखा है .. संस्कार जो मिले उसे बचपन से वह यही है कि इज्जत के साथ जियो .. तो कोई इज्जत की पोटली ले कर चलता है तो कोई गठरी| जैसी औकात वैसी गठरी का आकार .. बहुत इज्जत वालों की गठरी बहुत बड़ी होती है ..पर उसकी मजबूरी यह कि वह गठरी नहीं उतार सकता| वह उसके नीचे पिसता चला जाता है ..पर सेल्फ इन्फ्लेसन/ मिथ्या दंभ  भी तो कुछ चीज है .इस गठरी की शान बनाये रखने के लिए वो आम जगह पर खुल कर मुस्कुरा भी नहीं सकता और दो शब्द नपे तुले ही बोल पाता है ..वह अपने मन की बात भी किसी से साझा नहीं कर पाता कि कहीं इज्जत की गठरी हलकी ना हो जाये और वह हल्का आदमी कहलाये  .. और जिसके सर पर  छोटी पोटली भी है तो वह भी सर पर ही रहेगी और प्रयास रहेगा कि पोटली का आकार बड़ता जाए .. मतलब कि गठरी और बड़ी और बड़ी बड़ी गठरी बन जाए …चाहे वह इस गठरी के नीचे थक कर चूर हो जाते हों, पसीना पसीना हो जाते हों, हांफ रहे हों पर उसको सर पर यूं थामे हैं की ज्यूं यही उनका सर हो यही शान हो|


                             सोचती हूँ कि आखिर इस गठरी में क्या होता होगा जो आदमी को जान से भी ज्यादा प्यारा है .. कभी सोचती हूँ कि अगर इस गठरी को खोलें तो क्या इस से मिलेगा अच्छे गुणों का बक्सा, धन की तिजोरी, कुछ साहित्य की किताबें, कुछ हुनर की चादरें, कुछ सामाजिक कार्यों का  लेखाजोखा, कुछ धार्मिक ग्रन्थ, या कर्म के औजार, संस्कारों का ब्यौरा, जातियों का और पीढ़ियों का ब्यौरा, कोई आईना लज्जा का जो कि बहुत जल्दी टूट सकता है -संभल के भाई, कोई तहजीब अदब का चिराग, तारीफों के पुलिन्दे, पीढ़ियों से एकत्र किये  तमगे मेडल, जाने क्या क्या होता होगा इसके अंदर |   गठरी तो अदृश्य  है सो आज तक खोल कर कोई भी  झाँक नहीं पाया और अगर दिखती भी है तो  सर से नीचे ताका झांकी के लिए उतारे  तो कैसे - गठरी तो  सर पर बनी रहनी चाहिए |


                                इस गठरी की आड़ में राजा रजवाडों से कितने ही षड्यंत्र अंजाम तक पहुंचे .. लोगो ने कितनी ही चोटें खायी पर चुप रहे| उन्हें  इज्जत की गठरी का हवाला दिया गया और वो लोग मर गए पर इस इज्जत की गठरी को सर से नहीं उतारा| इस की खातिर लोगों ने किसी को मार दिया, किसी को मरवा दिया या खुद मर गए, क्या आप लोग क्राइम पेट्रोल  देखतें हैं?  इस गठरी को बनाये रखने के लिए लोगो ने अपने पर होते जुल्मों को सहा और अपराधियों को बढावा दिया, अपने मौन को कायम रख इस डर से कि कहीं उनकी इज्जत की गठरी ना उतर जाए … और महिलाओं के तो सर पर उनके वजन के हिसाब से गठरी का बोझा जरा ज्यादा होता है.. बेचारी मारी जाती हैं .. घरेलू हिंसा हो, छेड़ छाड हो, बलात्कार हो या विवाहपूर्व या पश्चात प्रेम सम्बन्ध हो, या रोजगार के लिए गलत राह पर भटके बेरोजगार,  इज्जत की गठरी का ख्याल आते ही कोई इसकी शिकायत नहीं करता, हिंसा का शिकार होते रहते हैं, बलात्कार होते रहते हैं, छेड़ छाड चलती रहती है और  ये जुर्म चुपचाप सहे जाते हैं  ..घर के बुजुर्ग भी सलाह देते रहते हैं कि पुलिस में रपट ना करवाना, घर की इज्जत चली जायेगी  .. जिंदगी में किसी से कोई गलती हो जाए तो वह प्रायश्चित नहीं कर पाता क्यूंकि उसे उस गठरी का हवाला दिया जाता है कि तेरी गठरी उतार ली जायेगी और उसे बाधित किया जाता है गलत कार्यों की पुनरावृति उसकी मजबूरी हो जाती है वह एक कमजोर शिकार हो जाता है और  अपराध के हाथों उसका शोषण होता है .. तन मन धन उसको गलत राह पर लगाना पड़ता है सिर्फ इज्जत की गठरी को बचाए रखने के लिए | आज कल प्रेमी युगल को मौत के घाट उतार लिया जाता है उस नैसर्गिक भावना के लिए जो सृष्टि के सृजन की मूलभूत शुरुआत थी .. जो जान बूझ कर नहीं आती ..कहते है- जो खुद हो जाती है -- इस इज्जत की गठरी को बचाने के लिए “ओनर किलिंग” के नाम पर मासूमों को, जो सिर्फ  प्यार जानते है, को  बड़ी बेहरमी से मार मार कर उनकी हत्या कर दी जाती है और दुःख की बात ये कि रिश्तेदारों के सर की गठरी बड़ी हो जाती है| इस तरह इस गठरी की आड़ में कितने खून बहे, कितनों की सिसकियाँ दबी रही - और आगे भी इस गठरी ने कितनों को लीलना है मालूम नहीं|


                           किन्तु मैं यही चाहूंगी की हम इस झूठे शान की गठरी को सर से फैंक दें - हम अपने पर होते जुल्म के खिलाफ आवाज उठा सकें| क्यूंकि इज्जत तो गलत रास्तों पर चल कर भी कमा ली जाती है और पैसे के साथ इज्जत भी आ जाती है जैसे कुछ सफेदपोश बदमाश होते हैं  जब तक पकडें नहीं गए इज्जतदार होते हैं| क्या हम एक बहुत अच्छा इंसान और  मानव धर्म प्रेमी नहीं बन सकते .. हम इस मिथ्या की गठरी को तरजीह ना दें कर भला इंसान बनें तो कितना भला हो | यह एक इज्जतदार आदमी है या यह एक बहुत नेक इंसान है कोई कहें तो मैं एक बहुत नेक भला इंसान होना चाहूंगी और वह भी अपनी नजर में, अपनी आत्मा की नजर में |  मैं एक मिथ्या दंभ में नहीं फँसना चाहूंगी |
आप क्या चाहेंगे ..आपके क्या विचार हैं ?




डॉ नूतन गैरोला – २४ / ११ / २०११ १८: ०३
 

Wednesday, November 16, 2011

ये रास्ता कितना हसीन है - डॉ नूतन गैरोला


***ये रास्ता कितना हसीन है***

my_way_to_neverwhere_by_Dieffi

तू अपनी खुद्दारी की राहों पे चल निकल
जो ने तूने ठानी थी तू कर अमल|
ना ठुकरा अपनी झोपडी पुरानी ही सही
तू ईमान के बदले में न खरीद महल |
जीना तू गर जीना सर उठा के
बेईमानों का भी दिल ईमान से जाए दहल|
समेट ले खुद की इच्छाओं को
जीने की जरूरत हो जितनी तू उसमें बहल|


तू नवाजिश हो पाकीजा हो पाक पानी सी
खुद को बचा आज फैला है तिश्नगी का दलदल|

जिन दरख्तों पे खिलते हैं फूल ना ईमानी के 
तू चिंगारी बन कर ख़ाक कर दे वो जंगल | 
हो बुलंद इकबाल तेरा जरा तू संभल
नेकी की राहों पर चल के आगे निकल |
समेट ले खुद की इच्छाओं को
जीनेभर की जरूरतों में तू खुश हो बहल ||....
डॉ नूतन गैरोला २३ :४६ १५ -११- २०११

Friday, November 11, 2011

मौन बातें - डॉ नूतन गैरोला









बातें
बेहिसाब बातें
हलचल मचा देतीं हैं
नटखट मछलियों सी
मन के शांत समंदर में
जबकि
भीतर गुनगुनाती है, गाती हैं शांत लहरें
और शांति की समृद्धि से तर खुशियाँ भरपूर रहती है
मेरे शब्द रहते हैं मौन
बेसुध मैं अनंत शांत यात्रा में
होती हैं मौन बाते खुद के मन से
लेकिन जब
मन रहता है मौन
और शब्द बिन आवाज
बोलने लगते हैं कुछ दिमाग
अनजान जो खामोश रहस्यों से
छिड़ जाता है एक संग्राम 
उनके कटु शब्दों का
मेरे मौन से …
तब
बलिदानी होता है
मौन |
और शब्दों को
स्याही का  
आवाज का अम्लिजामा देता है 
उन अस्थिर अशांत मन में
करता है शांति का पुनर्वास
और  
अपने शांत मन का चैन खो
उनको चैन देता है |…



डॉ नूतन गैरोला


लिखी गयी – ११ / ११ /११  ११:११ …बहुत आश्चर्य हुआ जब लिख कर फेसबुक में पोस्ट कर रही थी कम्प्युटर ११:११ am 11-11-11 तारीख दिखा रहा था … याद  आती रहेगी ये तारीख ….. हां कविता लिखते समय अन्ना जी के मौन व्रत की याद आई … लेकिन वह अलग था ..


फेसबुक पर मेरी पोस्ट का हिस्सा


१)

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नफरतों से कह दो हमसे दूर रहें वो
प्रेम से हमें फुर्सत कहाँ
उसमे ही खो कर हमें
खुद को पाना है वहाँ……

 
२)
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जीवन दर्पण कांच का, मोह धूल लग जाए,
धुल जाए ये धूल जो, तुझको तू मिल जाए|.
 
 
३)
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एक दिल हो जो न हो कठोर कभी - दयालू हो
एक स्पर्श हो सदा जो कोमल हो - सहारा बने
अग्नि न बने जो झुलसाये किसी को - छाया हों
भावना हो जो कभी चोट न दे किसी को - मरहम बने |
 
नूतन

Sunday, October 30, 2011

कविता और रोटी – डॉ नूतन गैरोला -३०अक्टूबर २०११ १७:४०


     Roti


यूं तो कविताओं में अक्सर
जिक्र होता है भूख का
और भूखे की रोटी का,
लेकिन जब भी मैं रोटी बनाती हूँ
मन रसोई की खिड़की से कहीं बहुत दूर होता है
और आँख होती है तवे पर रोटी पर ,आदी हूँ ना|
मन बीते समय की सड़क पर
भागता जाता है आज और  दसकों पीछे तक
और हर पड़ावों पर रखी पोटली से निकालता है यादों का आटा
वेदना और आनंद से पूरित संवेदनाओं से सिंचित कर
मन बेलता कविताओं की रोटी कई कई प्रकार की
आड़ी तिरछी,
फिर चुन लेता है, उनमें से सबसे सुन्दर आकार
और उस बेहद सुन्दर आकार को
व्याकरण की आंच पर पकाता है जरूरत भर
कि कविता की रोटी मन के संग फूल कर फुल्का हो जाती है ..
और फिर भावनाओं की चटनी, शहद. दही सब्जी,
के साथ परोसी और चखी जाती
रोटी का स्वाद लजीज वह रोटी दिल को अजीज ..
उधर तवे पर पकी रोटियां परोसती हूँ ..
जो सबकी भूख को कर देती है शांत
और कविता की बनी सुघड रोटी मन में ही  दम तोड़ लेती है
पन्ने पर आकार नहीं लेती है,
समय नहीं मिलता(बहुत दुख  है) कागज़ की थाली पर कलम से रोटी को अतारने का हाँ समय मिलता या दे दिया जाता तभी
अगर वह भूखों की भूख को मिटा सकती
बेरोजगारी में रोजगार दे सकती
तब बड़े बुजुर्ग कहते बेटी तू कविता लिख ..
किसी को मुझसे कविता की अपेक्षा भी नहीं
लेकिन मुझे दुःख नहीं..
कल फिर चूल्हा जलाऊँगी
तवे पर होगी एक रोटी भूख की
और मन में एक रोटी बेहतरीन कविता की बनाउंगी|


डॉ नूतन गैरोला

Friday, October 21, 2011

नागफनी और गुलाब - डॉ नूतन गैरोला २१-१०-२०११ १६:२५

  
नागफनी और गुलाब

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दूर दूर रहते थे नागफनी और गुलाब,
था एक घनिष्ठ मित्र जोड़ा -
एक दिन नागफनी एकांत से झुंझला कर
ईर्ष्या से बोला -
ऐ गुलाब!!
घायल तू भी करता है अपने शूलों के दंश से
फिर भी सबका प्रिय है तू अपने फूलों और गंध से|
तू दुलारा माली का कहते हैं बगिया की तुझसे शान है
लेकिन मुझमे ही ज्यादा ऐब हों ऐसा मुझे  ज्ञान नहीं |
तुम ही बोलो क्या मुझमे ही ढंग से जीने का ढंग नहीं |
जबकि मुझ पर पल्लवित पुष्प भी कुछ गुणी और सुन्दर कम नहीं |
फिर भी मैं निर्वासित हूँ, माली द्वारा परित्यक्त हूँ |
एकांत में जीने के लिए मैं क्यों कर इतना अभिशप्त हूँ|
भूल से उग आया था बगिया के अंदर मैं
तब उखाड बाहर फेंका गया था मैं निर्जन बंजर में|
मेरा ना कोई माली ना मुझको कोई छाँव है
और तू जी रहा है बगिया के भीतर सुन्दर फूलों के गाँव में |
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सुन कर गुलाब ने चुप्पी तोड़ी|                          
धीमे से बोला -
मुझको करता है माली बेहद प्यार, इससे मैं अनभिज्ञ नहीं
फिर भी जाने क्यों  मैं माली का हृदय से कृतज्ञ नहीं |
वो कहतें हैं कि उनकी बगिया की शान हूँ मैं
मुझ बिन उनके गुलदस्ते में आती जान नहीं |
तोड़ लिया जाता है मेरे पल्लवित सुमन को
सौगात बना कर  हर बार लुभाया जाता है प्रेमियों के मन को |
मेरी सुंदरता, मेरी कोमलता को वो करते हैं अर्पण
जहां होते हैं उनके श्रधेय आराध्य के चरण |
भाग्य के मीठे फल की उनकी कामनाओं पर
चढ़ा दिया जाता हूँ देवताओं के शीश पर,
मेरे खिलते सुकुमार सुमन 
चढ़ जाते हैं बलि की भेंट बन श्रद्धा सुमन|
 
इस सबके बीच मुझे बस सिर्फ खोना है |
उनकी इच्छाओं के लिए मुझे तो सिर्फ अर्पित होना है|
मेरी  दुनियाँ की परिधि है सीमित संकुचित इतनी
जैसे मेरे तनों  पर मेरी पत्तियां चिपकी हुवी |
मुझे नहीं मिल पाया मेरा खुला आसमान मेरी जमीन
मैं बंद दीवारों में घुटता रहा हूँ  तू कर  यकीन |
जड़ें मेरी सिमट कर आश्रित हो गयी हैं उनकी दया पे
उनके रखरखाव के बिना लटक कर गिर जाऊँगा धरा पे|
 
ऐ नागफनी !!                   
देख तू ना बंधा है इस सुन्दर दिखने वाली कैद में
मिला तुझे अपना एक विस्तृत संसार माली रुपी मोक्षद से|
खुले आसमान ने जगा दी है तेरे जीने की तीव्र  इच्छा व जीवटता
अकेले ही तू ऋतुवों के आक्रोश से रहा लड़ता खटता|
अब माली के बिना तपिश में जीने के लिए ढल गया है तू 
अपनी हरियाली के भीतर नीर का शीतल समंदर बन गया  है तू|
जुझारू तेरे निहित गुण से ऊर्जस्वी हो गया  है तू
प्रस्फुटित होते पुष्प तुझ पर, खुद मुकुलित हो गया है तू|
पुष्प तेरे भले ही लुभाते हो सभी को
कोई तेरे पुष्पों को तोडेगा, नोचेगा या अर्पित करेगा
इस बात का तुझे डर नहीं
इस विछोह का तुझे कोई भय तो नहीं |
इसलिए हे नागफनी!
तू माली को धन्य कर
अपनी धरती से तू नाता गहरा कर
और बंधनमुक्त जीवन को महसूस कर|
 
गुलाब की बातों पर नागफनी खुशी से मुकुराया
नागफनी को खुश देख गुलाब भी मुस्कुराया |
खुले में मंद बयार चलने लगी, नागफनी आनंद लेने  लगा|
और गुलाब, वापस बगिया के अंदर ठहरी हवा में सिहर कर  सिमट गया|
 
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डॉ नूतन गैरोला    २१- अक्टूबर  - २०११

Monday, October 17, 2011

वह अनजान स्त्री - डॉ नूतन गैरोला

   
                       ghunghat

     आज भी याद आता है
    पोस्टमार्टम कक्ष में
    जब लायी गयी थी वो हमारे सामने
    बेहद खूबसूरत कमसिन थी
    पीली साड़ी उस पर चटख नारंगी फूल
    लावण्यता से भरपूर रूप खूब निखरता था|
     कोंटरास्ट की चोली
     शायद रंग नीला था ..
     माथे पर एक बड़ी लाल गोल बिंदी
     चमकता कुमकुम था|
     भरभर चूड़ी हाथ, मांग भर सिंदूर
     दमकता सुहाग उसका था ..
     पर जैसा दिखता था सबकुछ
     वैसा कुछ भी तो ना था ..
     बात बेहद दुखद थी 
     वह सिर्फ एक ठंडा जिस्म थी ..
     एक दरख़्त पर एक फंदे से  
     फांसी पर झूली थी  ..
     क्या सच था क्या झूठ था
     उसकी ख़ामोशी के संग सच भी निःशब्द था..
     एक चाक़ू बेरहम सा पर जरूरी 
     चीर गया था उसके जिस्म को कई कोनों से
     पेट, आतें, दिल, फेफड़े, गुर्दे, मांसपेशी, चमड़ी सब व्याख्या कर रहे थे     मौत के कारण  का 
      खूबसूरती के नीचे छुपा सत्य उसके उत्तकों के संग बाहर आ कर उघड़ गया था ..
      तब बोले थे ज्यूरिस के प्रोफ़ेसर देखो सच्चाई
      मौत फांसी से नहीं, मौत के बाद फांसी लगाई 
      हाथों की चमड़ी के नीचे जमे खून के थक्के थे
      हैवानों ने उसके हाथों को कितना कस के मरोड़ा था, देख हम हक्के बक्के थे|
      शायद मरने तक उस पर जकड़ा गया था शिकंजा
     और गालों के भीतर  होठो में छपे उसके स्वयं के दांतों के निशान
     बताते थे उसकी साँसों को उसकी आवाजों को जोरों से मुँह दबा के रोका था
     गले पे कसे गए शिकंजे के थे गहरे निशान
     उसकी उखडती साँस को
      बेरहमी से घोटा गया था ….
      महज उन पिशाचों की हवस के लिए
      उसने अपने परिवार अपने शरीर और आत्मा को खोया था और खोया था
      एक माँ ने बेटी, बच्चों ने अपनी माँ और पति ने अपनी चाँद सी पत्नी|
      उसकी आँखों के चमकते सितारों को
      सदा के लिए बुझा दिया गया था
      लाश को उसकी पेड़ पर फांसी पर झुला दिया गया था
      फिर एक नया मोड एक नयी कहानी 
      मौत के बाद भी एक इल्जाम उसके मत्थे मङ दिया गया था |
      कि जिन्दा रहने से वो घबराती थी
      बुजदिल थी वह
      इसलिए वह आत्मघाती बन सबसे नाता तोड़ गयी |

      डॉ नूतन गैरोला – १७- १० - २०११
            
 
   ये सच ही तो है और कितना भयानक सच… एक देह जिसके अरमान थे, जीवन अभी बचपन से उठ कर खिल रहा था - गाँव की वह विवाहित अति सुन्दर बाला की सुंदरता उसे किस कदर  हैवानों के आगे लील गयी… आज भी मुझे याद आता है तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं …. उसके जिस्म के टुकड़े होते हुवे देखे.. एम् बी बी एस के तृतीय वर्ष में उस दिन का अनुभव हमारे लिए नया था ..उस के बाद तो आम हो गया| 

                                         मोर्चुरी का पहला दिन

                 याद आने लगता है मुझे मेडिकल कॉलेज और एम्,बी.ब.एस कोर्स का तीसरा साल / दूसरा प्रोफेसनल … हमें १५ - २० बच्चों के ग्रुप में बाँट लिया जाता था - और स्थान – मोर्चुरी - जहाँ रहस्यमय मौत या सडन डेथ के कारणों का और मौत के समय का पता करने के लिए मरणोपरांत शवपरिक्षण (postmortem) किया जाता है| यह महिला सुन्दर पीली साड़ी में ऐसा लगता था जैसे अभी बोलती हो… बस जरा गले की ओर नजर ना पड़े तो| हम सब का दिल भर आया था| और उसकी बातें कर रहे थे वो हमारे लिए अनजान थी और मात्र एक शव थी जिस में हम जीवन के अंश ढूंढ रहे थे|
     
            दूसरा शव एक छोटे बच्चे का था उम्र लगभग ५ साल - बैलगाडी के पहिये के नीचे सर आ जाने से मौत हुवी थी||
    
             तीसरा शव दो हिस्सों में विभाजित दो टुकड़ों में, रेलवे क्रोसिंग पर यह शव मिला था|

        और चौथा शव - एक प्युट्रीफाइड लाश एक  पुरुष की - पेट  सडती हुवी गेस से  गुब्बारे की तरह फूल गया था - पेट के अंदर गेस का प्रेशर इतना ज्यादा था कि जीभ पूरी मुँह से बाहर निकल कर फूल गयी थी| सड़ी बदबू से बुरे हाल हो रहे थे| हम लोग वहाँ से भागना चाहते थे किन्तु टीचर का डर था| रेजिडेंट्स वहाँ खड़े थे सों बाहर की खुली हवा में जा नहीं सकते थे .. नाक पर रुमाल लिए थे| पेट उलट रहा था | कि दो आदमी बहुत बड़े चाक़ू ले कर आये एक ने उसके पेट पर उलटे चाकू से हल्का निशान लगाया ..ताकि इन्सिजन की लाइन को हम भी समझ सके..तब उसने पेट पर जैसे ही गहरा चाकू घुसाया,  पेट से ब्लास्ट करती हुवी सड़ी हवा पुरे वेग से बाहर छत पर टकराई और साथ में कीड़ों / मेगेट्स का फव्वारा खुल गया ..कीड़ों की बारिश सी होने लगी… सभी विद्यार्थी कमरे से बाहर भागे …किन्तु दरवाजे में रेजिडेंट टीचर बाहर से आ कर खड़े हो गए| हुक्मनामा हुवा ..अंदर जाओ -- मेरे सभी साथियों का चेहरा घृणा से लाल और शरीर बदबू से बेहाल हो रखा था … हम लोग कमरे में उल्टियां कर रहे थे और विशेषग्य लोग शव  से विसरा के सेम्पल कलेक्ट कर रहे थे --- कैसे थे वो दिन .. मुस्‍कान  
-- डॉ नूतन गैरोला १७ – १० – २०११    23:38

Thursday, September 22, 2011

एक दर्द -हाईकु - डॉ नूतन गैरोला–१)



जाना था हीरा,
बेपरखा भरोसा
मिट्टी निकला|


Diamond






तुम बिन है,
संग मेरे विराना,
अकेली नहीं|

lonliness      





अपने थे जो
तोड़ गए दिल को
अपने हैं वो|

Broken-Heart-48







खामोशी बोली
मुझसे बातें करो
चुप्पी ना भली|

lo2






बाद उसके
जाने के जाना था कि
थी वो बहार |

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डॉ नूतन गैरोला

तस्वीरें -नेट से
आभार उनका जिनकी ये तस्वीरें  हैं|
अखिरी पेंटिंग - चित्रकार ग्रेग चेडविक , केलिफोर्निया 


Sunday, August 7, 2011

तुम्हारे लिए …. डॉ नूतन गैरोला

 


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हे पुरुष!
तुम मायासुत जैसे,
मर्यादित..
तन मन की व्यथा भुला कर ..
भूख प्यास से ऊपर उठ कर ..
घर द्वार को पीछे रख कर ..
दंभ हिंसा से कोसों दूर 
दया, प्रेम को अपनाकर
निष्कपट हो कर…
नीतिपथ पर
निर्विकार
सतत कर्म की
मानवसेवा की अलख जगाये हो|


सुन !!
फिर भी तुम
मायासुत ना बन सकोगे …
जानती हूँ कि
यूँ तो
यश की तुम्हें कोई कामना नही|
फिर भी
सत्कर्म कर
नीतिपथ पर चल कर भी
उंगलियां उठती रहेंगी तुम पर कितनी
और तुम उनमें कुछ आभाविहीन उंगिलयों को जर्द जान
प्राण सिंचित कर दोगे
अपनी रक्त  लालिमा से|
और अडिग अपने पथ,
कर्तव्य की बेदी पर
मानवता की सेवा में
अदृश्य ही बलिदानी हो जाओगे|



इसलिए हे पुरुष !!
तुम वन्दनीय हो|
तुम श्रेष्ठ हो|
तुम पूर्ण हो|
तुम ह्रदयकोष्ठ में  हो|


डॉ नूतन डिमरी गैरोला … ७/८/२०११ … २२:४२

फोटो - मेरी खींची हुई

Saturday, July 23, 2011

रात में अक्सर - डॉ नूतन डिमरी गैरोला



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रात में अक्सर
मेरी खिडकी से
एक साया उतर
कमरे की हवा में
घुल जाता है|
आने लगती है
गीली माटी की गंध
और आँखे मेरी फ़ैल जाती है छत पर
जहाँ से अपलक निहारता है मुझे
मेरा वृद्ध स्वरुप|


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रात में अक्सर
जब लोग घरों के दरवाजे बंद कर देते हैं
तब खुलता है एक द्वार
कलमबद्ध करता है
कुछ जंग खाए
कुंद दिमाग के जज्बात
और मलिन यादों के चलते
जो अक्सर रह जाते हैं शेष |


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रात में अक्सर
याद आता है वो सफर
जो सफर नहीं था
था एक ठहराव खुशियों का
खिलखिलाती ताज़ी कुछ हंसी
जैसे किसी काले टोटके ने रोक ली हो
और मुस्कुराता चेहरा
धूमिल हो डूब जाता है
आँखों के सागर में |


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रात में अक्सर
जब शिथिल हो कर
गिर जाती है थकान
शांत बिस्तर में
रात उंघने लगती है तब 
पर तन्हाइयां उठ कर जगाने लगती हैं
और कानाफूसी करती है कानों में  
नीलाभ चाँद देर रात तक
खेला करता तारों से|


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द्वारा - डॉ नूतन डिमरी गैरोला
सभी चित्र नेट से … उनका आभार जिनकी ये तस्वीरें हैं ..

Wednesday, July 13, 2011

पुनर्वास - डॉ नूतन गैरोला


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                     अस्पताल की छत से वह
                                        आज चुपचाप महसूस करना चाहती  थी--
                     साँसें जो उखड रहीँ थीं
                                       चंद घड़ियों का बस एक प्रश्न था…..
                    लय में  बीब  करती उपकरणों की आवाजें
                                      क्योंकि दिल अभी रुका ना था …….
                    सहमे से थे लोग सभी
                                      उनका अपना जुदा होने को था...
                   एक तीखा दर्द अभी महसूस हुवा था
                                     लगा, शरीर सेआत्मा का रिश्ता बचा हुवा था…
                    तभी गडगडाहट शुरू हुवी मशीनों की
                                     ऑक्सीजन, डीफ्रिब्लेटर और थपथपाहट
                                                     सीने में घुपता तीखा दर्द सुई का..
                    यह बहाना न चलेगा अब
                                      कोई और बहाना होगा जाने का फिर कभी 
                    वह जिद छोड़ छत से नीचे उतर आई
                                     पसर कर फिर से बस गई अपने टूटे घर में
                   
क्योंकि समय अभी शेष था देह का |



डॉ नूतन गैरोला … १३ / ०७ /२०११   १६:२४

Saturday, July 9, 2011

आखिरी लपक–डॉ नूतन गैरोला



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स्थिर थी वो
जो रक्स करती
रोशनियों के संग इठलाती|
आज चंचल बनी, कुलबुलाती है लौ|
कंपकंपाती है, थरथराती है लौ |
है घड़ी अंतिम बिदाई की
लपक आखिरी यूं लपलपाती है |
आत्मा की परी
लंबी उड़ान के लिए
ज्यूं पंख फडफडाती है |
कुछ चिंगारियां है शेष
धूमिल आखिरी धुवें का अवशेष
आँधियों का शोर जोरों पे है,
कालरात्रि का भंवर भोर पे है|
कमजोर अँधेरे उठ खड़े हुवे हैं
लुप्त होता जान लौ को
एक शीत मुस्कराहट के संग
अपने उजले भविष्य पर दंग
स्वागत गीत गाते हैं वो|
समय का खेल
जल चुका है तेल|
माटी से गढा दीया
माटी में पड़ा दीया
अब माटी होने को है|
रे कुम्हार!
सुन मेरी आखिरी विनती पुकार
कर सृजन अगण्य दीयों का|
जिनसे हार चुका उजाला
उस तमस को दूर करना
|

 

डॉ. नूतन गैरोला .. ९ जुलाई २०११



   

Tuesday, June 28, 2011

पुनरावृति - डॉ नूतन गैरोला डिमरी

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जीती रही जन्म जन्म,
पुनश्च मरती रही,
मर मर जीती रही पुनः,
चलता रहा सृष्टिक्रम,
अंतविहीन पुनरावृति क्रमशः|

 

                        डॉ नूतन डिमरी गैरोला

 

 

Wednesday, June 22, 2011

आजन्म कारावास और पेरोल पर कैदी - डॉ नूतन डिमरी गैरोला


                      आजन्म कारावास और पेरोल पर कैदी
 
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जब आशाएं बिखर जाती है

उम्मीद भी तार तार हुवे फटे दामन को सिकोड़ लेती हैं

तब वही निरपराध कैदी

जो बंधक बनते समय

हाथ पैर पटकता है

चिल्लाता है

कहता है

मेरा ये घर नहीं, मेरी ये जगह नहीं

और जेल में तमाम दूसरे कैदी उसकी मजाक बनाते हैं

कैसे कैसे उस पर वार करते हैं

अपने भाग्य पर रोता वह पुरजोर कोशिश करता है बाहर जाने की

खुली हवा में उड़ जाने की

वह देखता है नफरत भरी निगाहों से कैद की दीवारों को

जेलर को, जेल के नुमाइंदों को

और उन बदसलूक साथियों को जो जरूर अपराधी होंगे

या उसकी तरह बेवजह सबूतों के अभाव में बेड़ियों में जकड़े होंगे|

पर जेल में कैदी पर कितने ही जुल्म ढ़‌‍ाए

मानसिक शारीरिक सामाजिक अवसादों से घिर गया वो

और इतनी यंत्रणा दी गयी और प्रताड़ित किया गया कि

उसकी आवाज गले में फंस उसके लिए फांसी का फंदा हो गयी|

और तब वह हार जाता है अपनी ही आवाजों से

हार जाती हैं आशाएं,  उम्मीदें तिनका तिनका हवाओं में उड़ जाती है

तब वह

स्वीकार कर लेता है अपना आजन्म कारावास

मान लेता है उस जेल को अपना घर

और वहाँ की कडुवाहट घुटन ये उसके अपने जीने के सामान हो जाते है

वह जीने लगता है मरने के लिए

या मर मर के भी मरता है, रोज जीने के लिए

दसकों बाद उसका सदाचार सनैः सनैः हो जाता है उजागर

और फिर मुनादी होती है,आता है हुक्मनामा

कैदी के, पेरोल का |

कैदी असमंजस में

अब बाहर उसका कोई अपना नहीं

टूट चुके शीशों के किरचो सा, सपना भी कोई बचा नहीं

पहले उसे बदनाम किया था, अब कहीं उसका नाम नहीं

शीशे में खुद की सूरत भी तो बदल चुकी है

और अब तो बाहर की दुनियां भी अजनबी हो चली है

बाहर जाना मतलब बिना दीवारों की कैद में होना

सभ्य अजनबी चेहरों में अपने चहेते क्रूर बंदियों का अभाव का होना

और फिर पतझड़ में मुरझाया फूल गुजरे बसंतों में खिल नहीं सकता

इसलिये

गुहार करता है कैदी , हुक्मरानो से

पेरोल उसकी खारिज करो

बंद कैद में ही उसको सड़ने दो, मरने दो|




                                     डॉ नूतन डिमरी गैरोला      २२ – ०६ - २०११

              
              सोचती हूँ कितना दर्द होगा उन कैदीयों का, जो कभी बिना अपराध के ही परिस्तिथिजनित, असत्य साक्ष्यों की वजह से मुजरिमकरार किये जाते हैं और वो अपनी सफाई में कोई सबूत तक नहीं पेश कर पाते और भेज दिए जाते हैं कालकोठरी में जीवन बिताने के लिए, फिर उम्र के आखिरी पड़ाव में  उनको उनके अच्छे व्यवहार के लिए पेरोल पर छोड़ दिया जाता है| वो किन मानसिक यंत्रणाओं से गुजरते है जबकि उनको शारीरिक आघात भी कम नहीं पहुंचाए जा रहे होते है||
                 जेल के कैदी मानसिक रोगों से भी पीड़ित होते हैं जो बहुत लंबे समय तक अपना जीवन कैद में बिता रहे होते हैं उनमें “स्टॉकहोम सिंड्रोम  जैसी एक साईकोलोजिकल स्तिथि उत्पन्न  हो जाती है  और  कैदी जेल में दी जा रही यंत्रणाओं को व वहाँ के माहोल को पसंद करने लगता है….मानव मन, कैद की स्तिथि में कैसे प्रतिक्रिया करता है यह उसका उदाहरण है |
                       फिर  सोचती हूँ जमींदारी और सामंतवाद में कभी कभी जबरदस्ती दुल्हन बना ली गयी महिलायें भी  क्या ऐसा ही महसूस करती थी होंगी………………


                                              नूतन (नीति)

Friday, June 17, 2011

चंद्रग्रहण /Lunar Eclipse- 15 june 2011 –My Clicks My Photos- Dr Nutan Gairola


                 

                     आज के दिन

                                                      ( सोलह जून २०११ )

 

आज के दिन न मुझसे पूछो तुम

कितने अंधेरों ने बढ़ कर

मेरे दिन को सियह रातों में बदल दिया है|

मेरी खुशियों में पसर गए हैं कितने

दुःख भरे आंसू के बादल…….

आज के दिन छा रहे

घोर मायूसियों के सायों ने-

सितम के कितने नस्तरों से

मुस्कुराहटों का हक बींध लिया है|

आज के दिन पूर्णिमा को

ग्रहण के अंधेरों ने

बिन अपराध निगल लिया है|

हो कितना भी घना अँधेरा

 न हो निराश, वादा है

मिटा कर इन अंधेरों को,

चमकुंगा मैं फिर फलक पर

और मिल जाऊंगा धरा से

पाकिजा चांदनी बन कर |

 

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                आज की रात जब शुरू हुवी थी, पहाड़ पर चाँद यूं चढ़ने लगा| कल रात का ग्रहण भुला कर और चांदनी बिखेरता हुवा| दिन भर की धुप से झुलसा हुआ जंगल, शीतल चांदनी में नहा कर मुस्कुराने लगा, लहराना लगा |

 

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                                                        डॉ नूतन गैरोला




                                            पन्द्रह जून २०११



१५ जून की अर्धरात्रि को पूर्णमासी के दिन चंद्रग्रहण लगा था| मैंने कुछ तस्वीरें खींचीं थी| अगर किसी ने यह नजारा ना देखा हो तो  मैं उनमें से कुछ तस्वीरें यहाँ शेयर कर रही हूँ| पहली तस्वीर मैंने ००:१२ बजे से आखिरी १:३५ पर २ बजे पूर्ण चंद्रग्रहण था| मैंने देखा की चाँद पर बाई ओर से ग्रहण बढता हुआ दाई ओर फैलता गया और पूरी छाया ने चाँद को घेर लिया किन्तु ऐसा भी आभास हुवा कि इस बीच जब चाँद पर पूरी छाया थी तीन बार चाँद पर दाहिनी ओर से हल्का उजाला फ़ैल गया ..फिर बायीं ओर से अँधेरा .. ऐसा क्रम चल रहा था .. २ बजे बिलकुल अँधेरा था और उसके बाद मैं भी सोने चली गयी| ००:१२ से २:०० बजे तक के कुछ फोटो जो मेरे खींचे हुवे हैं…  


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                                                  ००:१२ पर चाँद  .. बायीं ओर से फैलती छाया

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                                                                    00: १७ पर


                   DSC_1591 

                                                             ००:३७ पर लगभग 

                     DSC_1604 

                                                                   १:१५ पर


                         DSC_1615

                                                             चाँद नहीं दिखा १:२५ 

                        
                                            


                            DSC_1617
                           
                                          दाहिनी ओर से बढते प्रकाश में चाँद कभी हल्का भूरा सा दिखता था|
फिर दो बजे चाँद नहीं दिखा और शायद उसके बाद गहरा ग्रहण लगा हो|


                                         सभी तस्वीरें मेरी खींची - डॉ नूतन डिमरी गैरोला 
                                                       शटर १/४००० से १/२००

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                                                    नाईटमोड में खींची फोटों   

     
                                    सभी तस्वीरें मेरी खींची – डॉ नूतन डिमरी गैरोला            

 

Saturday, June 11, 2011

क्या भटका रहे हैं बाबा और अन्ना - जागो भारत जागो

 

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       अरे!

                  जहाँ देखो लोग भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं …क्या इन्हें इतना नहीं पता कि भ्रष्टाचार तो जनता को आसानी से प्राप्त एक बहुत बड़ी सुविधा है जिसके रहते हर काम आसानी से हो जाते हैं | फिर ऐसा क्यूं … क्यूँ उठा रहे हैं ये आवाज … अन्ना जी और बाबा जी भी नाहक ही भूख हड़ताल में बैठे रहे / हैं  …. और अपने दस नहीं दस हज़ारों  दुश्मन बड़ा रहे हैं … हमें गर्व होना चाहिए के हम ऐसी जगह/ देश में  हैं जहाँ हर कठिन से कठिन काम भी इतनी सुगमता से संभव हो जाता है ज्यूं फूंक से तिनका उड़ाना…. लक्ज़री कार फरारी ( अपना  देश ) में बैठ कर भ्रष्टाचार के ईधन से हम मक्खन सी रोड ( असंवैधानिक /नाजायज /भ्रष्ट  कार्य ) पर फिसलते जा  रहे हैं और अपनी सुखद यात्रा पर इतराते हुवे अपनी मंजिल ( अनंत पैसों का जमावडा नितांत निज स्वार्थ के लिए)  की ओर बेरोकटोक अग्रसर हैं … फिर ये बाबा जी और अन्ना जी को क्या हो गया जो मक्खन वाली सड़क पर कांच, गारे, पत्थर  फैंक कर रोड़ा उत्तपन कर रहे हैं |

                                   छी छी छी.. कोई उन्हें समझाए कि एक ही तो सुविधा इस देश में आसानी से मुहैया है … जो भ्रष्ट लोगों को खूब भाती है… और ताकत से भरपूर राजनीती के कुछ नुमाइंदे इस भ्रष्टतंत्र के पोषक हैं  …जिनके चलते  आप घूंस कहीँ भी ले या दे सकते हैं … फिर भ्रष्टाचार जैसी सुविधा को अन्ना , बाबा , और जनता क्यों देश से हटाने पर तुले हैं… भ्रष्टाचार जैसी सुविधायें तो आम है .. ये सुविधाएँ आपको खड़े खड़े भी प्राप्त हो सकतीं हैं , कभी मेज के नीचे से , कभी लिफाफों के रूप में , कभी मिठाई के डब्बों में  बंद, कभी धूप में  किसी निर्माण क्षेत्र में , कभी बंद एयरकंडीसन्ड रूम में |
                                  

भ्रष्टाचार में पैसे का आदान प्रदान तो आम है ..जिसे घूंस कहते है| देखिये मैं इसके कुछ फायदे सिर्फ थोड़े में ही कह पाऊँगी -

 

                  घूंस देने के लाभ -

  • आप बीच सड़क में कचड़ा फैंक सकते हैं,
  • आप किसी को भी नाहक बेवजह पीट सकतें हैं,
  • आप योग्य नहीं है तो क्या इसके रहते आप बहुत योग्य लोगों को पछाड कर उनको ठेंगा दिखा सकतें है,
  • आपको किसी राशन की, किसी टिकट लेने की खिडकी पर  क्यू / पंक्ति कितनी भी बड़ी हो आप आगे ही रहेंगे … आपका काम पीछे के दरवाजे / खिडकी से हो जायेगा ..
  • आपके बच्चे नशे में गाडी चला कर राहगीरों को कुचल सकतें हैं ..पर उनका बाल बांका भी नहीं होगा .. 
  • आपके सौ खून भी माफ हो सकते हैं .. इतनी ताकत है इस सुविधा में
  • आप खाद्यपदार्थ में मनमानी चीजे मिला सकते हो ..दूध में चूना .. धनिया पाउडर में बजरी ..फल असमय ही पक जायेंगे और रंग उनका होगा ऐसा की दूर से ही मुंह में पानी आ जाए .. पर जांच पड़ताल कर भी आपको कोई कुछ ना कहेगा
  • आप कीमतों को अपनी मर्जी से बड़ाचढा  सकतें है |
  • बिना पढ़े ही आप डिग्री हासिल कर सकते हो|
  • लिखने लगूंगी तो पूरा ना होगा क्यूंकि हर क्षेत्र में घूंस आपको सुविधा देता है …इस लिए सुविधा लेने के फायदे भी अनंत हैं |
  • - - - - - - - - - - - - - - - -  - - - - - - - -  रिक्त स्थान की पूर्ती करो - यानि हर वह काम जो निकृष्ट है, अमानवीय है, अवैधानिक है, आप इस रिक्त स्थान में डाल सकते हैं…. भ्रष्टाचार में वो ताकत है जो इन कामो को बना ले…

 

 

        घूंस लेने के फायदे -

  • लोगों के बीच -  आप देवता बन सकते हैं - लोग कहेंगे देखो वह कितना अच्छा इंसान है कम से कम काम करवा तो देता है |
  • आप अच्छे नेता बन सकते हैं - जनता को बड़ी बड़ी योजनाओं का आश्वासान दें - बदले में मिलेगा योजनाओं से रिसता अकूत धन
  • आप जिस भी क्षेत्र में हैं ( जैसे घोड़े वाला, स्टोक वाला, टीचिंग वाला, निर्माण वाला, ऑफिस वाला मेज कुर्सी वाला या बस कंडकट्री वाला, इत्यादि)  आप ऐसी युक्ति अपनाइए की लोग घुंस देने के लिए बाध्य हों -- फिर आप अपनी तिजोरी देखिएगा ..दिन दुनी रात चौगुनी
  • रिश्तेदारों में, आस पड़ोस में  और देश में बड़ा नाम होगा ..लोग झुक झुक कर सलाम करेंगे|
  • घर में भी बहुत प्रेम मिलेगा , सुख सुविधा तो बेमिसाल होगी  ही आने वाली पीडियों के भी तारणहार होंगे आप ….   
  • समय कम है मेरे पास इस लिए ज्यादा नहीं लिखूंगी - आप भी वाकिफ होंगे फायदे से .. घर घर में घूंस की दौलत होगी तो देश का तो अपने आप जीर्णोद्धार हो जायेगा .. उसके नागरिक फलेंगे फुलेगे | … ४०० लाख करोड जैसी धनराशि विदेशों तक नाम कमाएगी …
  • आप के पास ताकत का साम्राज्य होगा जिस के रहते आप किसी से कुछ भी करवा या मनवा सकतें है या किसी पर भी डंडा चलवा सकतें है |

 

    जब आप के पास इतनी घूंस की दौलत हो तो  कोई पागल कुत्ते ने काटा है क्या जो बाबा जी  और अन्ना जी के साथ आंदोलन में बैठें या उनका साथ दें या खुद आवाज उठायें भ्रष्टाचार के खिलाफ|| आराम से घर में बैठेंगे या फिर कही छुपी गोष्ठी कर आंदोलनकारियों पर डंडे बल्लम की मार कर  अश्रु गोलों फैंकवायेंगें या उनके कपडे फाड़ेंगे … लोकतंत्र की सरेआम ह्त्या कर भ्रष्टाचार का साथ देंगे और इसके खिलाफ आवाज लगाने वालों के साथियों रिश्तेदारों पर भी डंडा कर देंगे, ताकि वो आवाज दुबारा ना उठा सके या फिर एन वक्त कोई और बेसरपैर की बात का  मुद्दा बना लिया जायेगा जैसे नृत्य विवाद- या अमुक इंसान  अपने देश का नहीं है ..और भोलीभाली जनता का ध्यान और चिंतन उस ओर मुड जाए , और असली मुद्दे से वो भटक जाएँ - तो हैं ना भ्रष्टाचार में अजब की ताकत

 

                        तो आओ क्यूं ना इस भ्रष्टाचार रुपी देवता की आरती उतारें   

 

 

जय भ्रष्टाचार देवा, जय भ्रष्टाचार देवा

जो कोई तुझको पुजत, उसका ध्यान धरे 

जय भ्रष्टाचार देवा …

तुम निशिदिन जनता का गुणी खून पिए

भ्रष्ट लोगन को खूब धनधान्य कियो

जय भ्रष्टाचार देवा

भ्रष्ट लोग जनता पर खूब खूनी वार कियो

दुष्ट भ्रष्ट लोगन को तुम असूरी ताकत दियो

जय भ्रष्टाचार देवा

जो कोई भ्रष्टी मन लगा के तुमरो गुण गावे

उनका काला धन विदेश में सुरक्षित हो जावे

जय भ्रष्टाचार देवा 

 


बहुत खेद के साथ कटाक्ष के रूप में उपरोक्त बातें  लिखी हैं | जब मैंने पाया सत्याग्रहियों और जनता पर आधी रात को इस तरह से आक्रमण किया गया जैसे आजादी से पूर्व अंग्रेजों के हाथ जलियावाला बाग था| तिस पर कई साथी लेखकों ने सत्याग्रह के खिलाफ, बाबा के खिलाफ,आवाज उठायी … और कुछ अजीब से नए मुद्दे बना डाले …मैं उनसे भी कहना चाहूंगी अभी मुद्दा  सिर्फ भ्रष्टाचार के खिलाफ है.. इस पर राजनीति नहीं चाहिए - सिर्फ और सिर्फ देशहित चाहिए |

 

  
जागो भारत जागो
देशहित के लिए आह्वाहन करती यह कविता अन्याय के खिलाफ सब को एकजुट होने के लिए प्रेरित करती है और वीररस से भरपूर है | इसके रचियता श्री अशोक राठी जी हैं  जिनकी कर्मभूमि कुरुक्षेत्र है| देश भक्ति की भावना से लबरेज  , स्त्री विमर्श पर और जीवन मृत्यु जैसे  दर्शन पर आपकी कवितायें खासा आकर्षित करतीं हैं | यहाँ पर देशहित के लिए हुंकार भरती अशोक जी की कविता को सबसे साझा कर रही हूँ 
 
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                                                  श्री अशोक राठी जी 

  

जागो भारत जागो देखो

आ पहुंचा दुश्मन छाती पर

पहले हारा था वो हमसे

अब फिर भागेगा डरकर  

शीश चढ़ाकर करो आरती

ये धरती अपनी माता है

रक्तबीजों को आज बता दो

हमें लहू पीना आता है

नहीं डरेंगे नहीं हटेंगे

हमको लड़ना  आता  है |

काँप उठा है दुश्मन देखो

गगनभेदी हुंकारों से

डरो न बाहर आओ तुम

लड़ना है मक्कारों से

आस्तीन में सांप पलें हैं

अब इनको मरना होगा

उठो जवानों निकलो घर से

शंखनाद अब करना होगा

देखो घना कुहासा छाया

कदम संभलकर रखना होगा

वीर शिवा, राणा की ही

तो हम सब संतानें हैं

कायर नहीं , झुके न कभी 

हमने परचम ताने हैं |

अबलाओं, बच्चों पर देखो

लाठी आज बरसती

हाथ उठे रक्षा की खातिर

उसको नजर तरसती

जागो समय यही है

फिर केवल पछताना होगा

क्या राणा को एक बार फिर

रोटी घास की खाना होगा

माना मार्ग सुगम नहीं है

दुश्मन अपने ही भ्राता हैं

लेकिन मीरजाफर, जयचंदों को

अब तो सहा नहीं जाता है

ले चंद्रगुप्त सा खड्ग बढ़ो तुम

गुरु  दक्षिणा देनी होगी

महलों में मद-मस्त नन्द को

वहीँ समाधि देनो होगी |

 

चढ़े प्रत्यंचा गांडीव पर फिर

महाकाली को आना होगा

सोये हुए पवन-पुत्रों को

भूला बल याद दिलाना होगा

बापू के पथ पर चलने वाले

हम सुभाष के भी अनुयायी

समय ले रहा करवट अब

पूरब में अरुण लालिमा छाई

आज दधीचि फिर तत्पर है

बूढी हड्डियां वज्र बनेंगी

और तुम्हारे ताबूत की

यही आखिरी कील बनेंगी

सावधान ! ओ सत्ता-निरंकुश

अफजल-कसाब के चाटुकारों

राष्ट्र  रहा जीवंत सदा यह

तुम चाहे जितना मारो | 

 


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जय भारत माता |

 

Monday, June 6, 2011

पतंग इच्छाओं की - डॉ नूतन गैरोला

   

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  उसकी पलकों में
सपनों की कीलों पर
इच्छाएं जीवनभर लटकती रहीं
उतरी नहीं जमीं पर
ठीक उसी तरह
जिस तरह
उसके बचपन की पतंग
शाखाओं के सलीब पर  अटकी रही
फड़फड़ाती रही, फटती रही
और बचपन अबोध आँखों से
पेड़ के नीचे इन्तजार करता रहा
डोर का, पतंग का|
कितने ही मौसम बदले
गर्मी आई बारिश आई
और कागज की लुगदी
टुकड़ा टुकड़ा टपकती गयी, बहती गयी
रह गया सिर्फ पंजर
बारिक बेंत का क्रोस
डाल पर झूलता
और वो पेड़ भी तो अब गिरने को है|

०६-०६ –२०११  २२:१५
डॉ नूतन गैरोला  

Sunday, May 1, 2011

वो स्त्री और चित्रकार - डॉ नूतन गैरोला


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वो एक कलाकार था और एक चित्रकार भी
रंग भरता रहा जिन तस्वीरों पर
यादों के पन्नों पर उकेरी वो आकृतियाँ
चटख रंगों से
हर आँखों में असमंजस भरती हुवी
मन का केनवास नहीं बदला था,
बदली नहीं थी कुछ हाथ की तूलिकाएं
बदला था दिल
बदल गए थे पात्र
महज कुछ तूलिकाएं जो जुडी थी उस स्त्री की यादों से
फैंक दी गयीं
दूर से ही केनवास पे नजरे गाढ़े वह स्त्री
और उसे जलाता गया वह चित्रकार 
निःशब्द थी वह स्त्री, मौन आवाक
और उंगलियां चित्रकार की खींचती रही नित नयी कई आकृतियाँ
निर्वस्त्र रेखाएं, पिघलते रंगों से दहकते ढकते
और आँखों पे उस स्त्री के कोई किरकिरा चुभता रहा
साँसों को काटता बरछी सा
सीने को चाक करता रहा
और वह मूक जलती रही
तीव्र प्रेम की वेदना में धुंवा धुंवा होती रही
जाना था उसने प्यार है
ये जलना, पिघलना, धुंवा होना, राख होना
उस स्त्री को रास आने लगा था जलना
कहती थी वह-
चित्रकार तू जलाता रह
तेरी जिद की हद भी मैं जानती हूँ
अब मैं सिर्फ धुंवा होना राख होना मांगती हूँ
और बस आखिर में एक और अहसान मांगती हूँ 
मेरी कुछ तस्वीरें जो बोझा होंगी नए चित्रों के रिश्तों में
और धूल में पड़ी कहीं कूड़े में अपना ठिकाना ढूंढती होंगी,
बस एक एक कर उन चित्रों को जला दे,
कर्ज इस स्त्री की वफ़ा का कुछ इस तरह चुका दे
फिर खुद को स्वछन्द खुली हवा दे,
और नए रंगों को, नयी आकृतियों को अपने केनवास  में पनाह दे,

इस जलन को इस आग को खुल के हवा दे|

 

 

nutan ..burning

Photo –  My Own Photo Edited in Web.

 

डॉ नूतन डिमरी गैरोला



 

Wednesday, April 20, 2011

मन की कैद - डॉ नूतन गैरोला


     मन की कैद

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एक अन्तविहीन असीम फैलाव..
आसमान से दूर अंतरिक्ष की गहरी ऊँचाइयों में,
सहस्त्र समुद्र से ऊँची अथाह गहराइयों में,
हर रेखा के अंदर और कितनी ही सीमाओं से बाहर
मन में उभरते असंख्य विचार|
विश्लेषण करता जोड़ता, नापता, काटता

स्वीकार करता या करता विद्रोह| 
रंगहीन या इन्द्रधनुष में चमकते रंग समूह
या फिर मिलते रंगों से बना श्वेत प्रकाश
हर कोने में हजारों प्रकाशवर्ष से दूर
या खुद के ही मन के अंदर
भूत, भविष्य, वर्तमान में विचरता मन|
बनाता अक्षरों का अद्भुत संसार,
और इस जिज्ञासू घुमक्कड़ को
एक ब्लैकहोल से खींच जकड लिया जाता है|
जहाँ उसका असीम फैला संसार समा कर सिकुड जाता है
और वह कैद कर लिया जाता है
एक छोटी सी दवा/ नींद की गोली में|

टेबलेट

 

डॉ नूतन गैरोला २०-४-२०११       

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