Showing posts with label आलेख-संस्मरण-विचार. Show all posts
Showing posts with label आलेख-संस्मरण-विचार. Show all posts

Thursday, November 24, 2011

इज्जत की गठरी–डॉ. नूतन गैरोला


                    07_2007_1-01junefea2-1_1185883920


                             हम सभी  इंसान, सनद रहे मैं यहाँ सिर्फ खालिस  इंसानों की बात कर रही हूँ इंसान के रूप में जो जानवर हो, यह पोस्ट उनके लिए कदाचित नहीं, तो सभी इंसान जीवन की दौड में किसी अनजान मंजिल की ओर भाग रहे हैं| एक मंजिल मिलती है तो दुसरी फिर उठ खड़ी होती है, फिर दौड जारी और यूं जीवन पर्यन्त हम दौड़ते रहते है बिना रुके| कभी मंजिल नहीं मिली इसका गम तो कभी मंजिल मिल गयी, अब जिंदगी का मकसद क्या है, इसका गम  .. लेकिन फिर भी एक नयी  मंजिल मिल जाती है… और भागते धावक की तरह या कछुवे की मानिंद हम मंजिल की ओर बढ़ जाते हैं पर इंसान कहीं भी अकेले नहीं होते  .. होती है उसके साथ उसके सर पर रखी इज्जत की पोटली या गठरी  ..जिसे आजन्म वह सर से उतार नहीं सकता..कोई गठरी की ओर ऊँगली उठा कर तो दिखाए वह मार देगा या मर जाएगा क्यूंकि उसने तो इज्जत पर मरना और मारना ही सीखा है .. संस्कार जो मिले उसे बचपन से वह यही है कि इज्जत के साथ जियो .. तो कोई इज्जत की पोटली ले कर चलता है तो कोई गठरी| जैसी औकात वैसी गठरी का आकार .. बहुत इज्जत वालों की गठरी बहुत बड़ी होती है ..पर उसकी मजबूरी यह कि वह गठरी नहीं उतार सकता| वह उसके नीचे पिसता चला जाता है ..पर सेल्फ इन्फ्लेसन/ मिथ्या दंभ  भी तो कुछ चीज है .इस गठरी की शान बनाये रखने के लिए वो आम जगह पर खुल कर मुस्कुरा भी नहीं सकता और दो शब्द नपे तुले ही बोल पाता है ..वह अपने मन की बात भी किसी से साझा नहीं कर पाता कि कहीं इज्जत की गठरी हलकी ना हो जाये और वह हल्का आदमी कहलाये  .. और जिसके सर पर  छोटी पोटली भी है तो वह भी सर पर ही रहेगी और प्रयास रहेगा कि पोटली का आकार बड़ता जाए .. मतलब कि गठरी और बड़ी और बड़ी बड़ी गठरी बन जाए …चाहे वह इस गठरी के नीचे थक कर चूर हो जाते हों, पसीना पसीना हो जाते हों, हांफ रहे हों पर उसको सर पर यूं थामे हैं की ज्यूं यही उनका सर हो यही शान हो|


                             सोचती हूँ कि आखिर इस गठरी में क्या होता होगा जो आदमी को जान से भी ज्यादा प्यारा है .. कभी सोचती हूँ कि अगर इस गठरी को खोलें तो क्या इस से मिलेगा अच्छे गुणों का बक्सा, धन की तिजोरी, कुछ साहित्य की किताबें, कुछ हुनर की चादरें, कुछ सामाजिक कार्यों का  लेखाजोखा, कुछ धार्मिक ग्रन्थ, या कर्म के औजार, संस्कारों का ब्यौरा, जातियों का और पीढ़ियों का ब्यौरा, कोई आईना लज्जा का जो कि बहुत जल्दी टूट सकता है -संभल के भाई, कोई तहजीब अदब का चिराग, तारीफों के पुलिन्दे, पीढ़ियों से एकत्र किये  तमगे मेडल, जाने क्या क्या होता होगा इसके अंदर |   गठरी तो अदृश्य  है सो आज तक खोल कर कोई भी  झाँक नहीं पाया और अगर दिखती भी है तो  सर से नीचे ताका झांकी के लिए उतारे  तो कैसे - गठरी तो  सर पर बनी रहनी चाहिए |


                                इस गठरी की आड़ में राजा रजवाडों से कितने ही षड्यंत्र अंजाम तक पहुंचे .. लोगो ने कितनी ही चोटें खायी पर चुप रहे| उन्हें  इज्जत की गठरी का हवाला दिया गया और वो लोग मर गए पर इस इज्जत की गठरी को सर से नहीं उतारा| इस की खातिर लोगों ने किसी को मार दिया, किसी को मरवा दिया या खुद मर गए, क्या आप लोग क्राइम पेट्रोल  देखतें हैं?  इस गठरी को बनाये रखने के लिए लोगो ने अपने पर होते जुल्मों को सहा और अपराधियों को बढावा दिया, अपने मौन को कायम रख इस डर से कि कहीं उनकी इज्जत की गठरी ना उतर जाए … और महिलाओं के तो सर पर उनके वजन के हिसाब से गठरी का बोझा जरा ज्यादा होता है.. बेचारी मारी जाती हैं .. घरेलू हिंसा हो, छेड़ छाड हो, बलात्कार हो या विवाहपूर्व या पश्चात प्रेम सम्बन्ध हो, या रोजगार के लिए गलत राह पर भटके बेरोजगार,  इज्जत की गठरी का ख्याल आते ही कोई इसकी शिकायत नहीं करता, हिंसा का शिकार होते रहते हैं, बलात्कार होते रहते हैं, छेड़ छाड चलती रहती है और  ये जुर्म चुपचाप सहे जाते हैं  ..घर के बुजुर्ग भी सलाह देते रहते हैं कि पुलिस में रपट ना करवाना, घर की इज्जत चली जायेगी  .. जिंदगी में किसी से कोई गलती हो जाए तो वह प्रायश्चित नहीं कर पाता क्यूंकि उसे उस गठरी का हवाला दिया जाता है कि तेरी गठरी उतार ली जायेगी और उसे बाधित किया जाता है गलत कार्यों की पुनरावृति उसकी मजबूरी हो जाती है वह एक कमजोर शिकार हो जाता है और  अपराध के हाथों उसका शोषण होता है .. तन मन धन उसको गलत राह पर लगाना पड़ता है सिर्फ इज्जत की गठरी को बचाए रखने के लिए | आज कल प्रेमी युगल को मौत के घाट उतार लिया जाता है उस नैसर्गिक भावना के लिए जो सृष्टि के सृजन की मूलभूत शुरुआत थी .. जो जान बूझ कर नहीं आती ..कहते है- जो खुद हो जाती है -- इस इज्जत की गठरी को बचाने के लिए “ओनर किलिंग” के नाम पर मासूमों को, जो सिर्फ  प्यार जानते है, को  बड़ी बेहरमी से मार मार कर उनकी हत्या कर दी जाती है और दुःख की बात ये कि रिश्तेदारों के सर की गठरी बड़ी हो जाती है| इस तरह इस गठरी की आड़ में कितने खून बहे, कितनों की सिसकियाँ दबी रही - और आगे भी इस गठरी ने कितनों को लीलना है मालूम नहीं|


                           किन्तु मैं यही चाहूंगी की हम इस झूठे शान की गठरी को सर से फैंक दें - हम अपने पर होते जुल्म के खिलाफ आवाज उठा सकें| क्यूंकि इज्जत तो गलत रास्तों पर चल कर भी कमा ली जाती है और पैसे के साथ इज्जत भी आ जाती है जैसे कुछ सफेदपोश बदमाश होते हैं  जब तक पकडें नहीं गए इज्जतदार होते हैं| क्या हम एक बहुत अच्छा इंसान और  मानव धर्म प्रेमी नहीं बन सकते .. हम इस मिथ्या की गठरी को तरजीह ना दें कर भला इंसान बनें तो कितना भला हो | यह एक इज्जतदार आदमी है या यह एक बहुत नेक इंसान है कोई कहें तो मैं एक बहुत नेक भला इंसान होना चाहूंगी और वह भी अपनी नजर में, अपनी आत्मा की नजर में |  मैं एक मिथ्या दंभ में नहीं फँसना चाहूंगी |
आप क्या चाहेंगे ..आपके क्या विचार हैं ?




डॉ नूतन गैरोला – २४ / ११ / २०११ १८: ०३
 

Wednesday, January 26, 2011

आओ जश्ने आजादी मनाएं- एक व्यंग बाण - डॉ नूतन गैरोला २६-जनवरी २०११

          
                     सभी ने लिखी देश पर, वीरता पर, प्रेम पर गद्य या पद्य
                                            और वो बैठे कतराए
 
                    corruption
उन लोगो का क्या जो देश के लिए इतना जोखिम भरा काम कर रहे हैं | घूंस, चोरबाजारी, रिश्वतखोरी, साम्प्रदायिकवाद , दंगे, झूठ, धोखा- बोल लिख और करके देश के साथ गद्दारी करके खुद को निशाने की शूली में टांग देते हैं | बेचारे कोई उन पर दया भी नहीं करता | वो बेचारे तो नकारात्मक भूमिका निभाते हैं , कितना ख्याल रखते हैं  हमारा ताकि हमारी गुणवत्ता को लोग तुलनात्मक पहलू से  पहचान सकें | वो जमाखोरी करते हैं, महंगाई बढ़ाते है तो कोई खुद के लिए नहीं , हमारे लिए, हम जो लग्जरी में जीने के आदी हो चुके हैं, हमारे लिए पैगाम है उनका – भाई थोड़ी थोड़ी दूर के लिए कार या गाड़ी ही क्यों ? क्या भगवान के दिए हुवे दो पैर नहीं है चलने के लिए, न कोई पेट्रोल डीज़ल भरवाने का झमेला ना कोई धुंवा-पोल्युसन |  फिर रशोई में कौन कहता है कि दो दो प्याज डालो  और बनाओ सब्जी, प्याज हमारी कोई मूलभूत जरूरत तो नहीं- मत खाओ कुछ दिन प्याज तो जमा गोदाम में अनाज / प्याज सड़ने लगेगा वो बेचारे खुद कम कीमत पर हमारे लिए प्याज उपलब्ध करवा देंगे | ( हां जरा किसानो की सोचती हूँ तो डर लगता है - वो बेचारे दो धारी तलवार पर खड़े ) और फिर देखो न हिम्मत उनकी - उन्हें तो सजा ही मिलेगी , ना मिलेगा कोई तग्मा- पुरुस्कार – उनकी हौंसला  अफजाई के लिए भी कोई नहीं | हम लोग अच्छा काम भी डर डर के बच बच के करते हैं, अच्छे काम के लिए जल्दी से आगे आ कर स्वीकार नहीं करते और वो सजाओं की शूली पर लटकते हुवे भी, कितने बहादुर हैं, निर्भीक हैं, कैसे कैसे घपलों  को अंजाम देते है, बिना किसी सरकारी मदद के और सरकारी मदद मिले तो वो भी कोई बड़ा भारी घपला का अंजाम होगा - देनी पड़ेगी उनको दाद | कुछ तो नेताओं की सफ़ेद वर्दी में करते है बड़े बड़े ऐलान ...आहा क्या मज़ा आता है उनकी बड़ी बड़ी बातों में ..काश की वैसा होता जैसा उन्होंने कहा .. नहीं जी इधर ऐलान हुवा उधर पैसों का खिसकान / फिसलना शुरू हुवा उनकी तरफ | उन्हें तो जनता जनार्दन का भी डर नहीं, कितने बहादुर हैं ये, क्यों नहीं वो बड़े बड़े घपलों के लिए बड़े बड़े एवार्ड घोषित करते है, एवार्ड भी मिलेगा और एवार्ड के बिकने पर पैसा भी, और एवार्ड की फेरहिस्त में हेरा फेरी करने पर भी आमदनी  ..एवार्ड का नाम क्या होगा तब - श्री उपद्रवी, घपलाबाज नंबर -१ एवार्ड ,श्री श्री रिश्वतखोर कामचोर भारत श्री एवार्ड, बिना डकारे भूसा खाए शेर एवार्ड, आदी आदी – कुछ नाम में मदद आप लोग भी कीजियेगा| हां श्री शब्द का गलत इस्तेमाल नहीं होना चाहिए इसका भी ख्याल रखूंगी  | और तिस पर जो पैसा आएगा वो भारत के किसी भी काम का नहीं क्यूंकि भ्रष्टाचारी जी उसे स्विस बैंक में पहुंचा देगा| देश में पैसा कम तो लोग निर्माण, खरीद फरोख्त कम करेंगे, कुछ लोग भूखे रहना सीख लेंगे और जब पैसों का लेन देन कम होगा तो घूंसखोरी कम होगी ..तो अप्रत्यक्ष रूप में ये भ्रष्टाचारी  देश के लिए काम कर रहे है.. संविधान बना, लेकिन विधानों से बचने बचाने के उपाय तो ये खूब जानते हैं बस जरा जेब गरम .. और जहाँ ना लागू हो वहाँ जोरजबर्दस्ती लागू करवाया जाता है ताकि आप बचने के लिए टूट जाएँ और आप घूंस देने जैसा बड़ा अपराध करें और बड़ा नाम कमाएँ ... जय हो इन भ्रष्टाचारी भाई बहनों की



आओ आओ जश्ने आजादी मनाएं
आओ आओ फिर कुछ नया गुल खिलाएं
संविधान बना क़ानून बने
क़ानून के नाम पर कुछ अतिरिक्त कमाएँ |
 
आओ आओ जश्न ऐ आजादी मनाएं
आओ आओ फिर एक नया गुल खिलाएं |
 
फूल होंगे बीमारी के भ्रष्टाचार के
राजनीति में पैंठे रिश्वतखोर चोरचकार के
जय जयकार करते घुंसखोर चमचे
अपराधी कातिल अपहरणकरता धूर्त आचार के |
आओ आओ फिर नवनिर्माण करवाएं
कुछ नयी भवन सड़के पुल बनवाएं
उद्घाटन तक न जो टिके कुछ इस कदर कमाएँ |
 
आओ आओ जश्ने आजादी मनाएं
आओ आओ फिर कुछ नया गुल खिलाएं |
 
आओ आओ सट्टेबाजी में धन लगाएं
एक नहीं अनेकों स्विस बैंक में खाते खुलवाएं |
किसी के पास झोपडी नहीं तो क्या, झूठे ऐलान कर तो  दो 
बहते पैसों से खुद के घर भरवाएं
अपने देश दुनियाँ में फ्लेटों की संख्या बढाएं
महंगाई, चोरबाजारी, जमाखोरी की दुकानें खुलवाएं
 
आओ आओ जश्ने आजादी मनाएं
आओ आओ फिर कुछ नया गुल खिलाएं
 
आओ आओ हर रोज कुछ नए क़ानून बनाए|
भोली भाली जनता अकबक, कल तक मार्ग यही था
आज वन वे कैसे हुवा
खौफ क़ानून का पुलिस का उन पर हो
जो भोली है, निश्छल जनता है
आओ कानून का डंडा उनके सर पर जोर से घुमाएँ
चलती गाड़ियों को रुकवाएं
कोने ले जा कर अपनी जेबें गरम करवाएं |
 
आओ आओ जश्ने आजादी मनाएं
आओ आओ फिर कुछ नया गुल खिलाएं
संविधान बना क़ानून बने
क़ानून के नाम पर कुछ अतिरिक्त कमाएँ |
अपनी भारत माता का नाक कटवाएं |
 

मेरे वचन कडुवे बहुत लग रहे होंगे क्यूंकि मै कडुवी  हकीकत के खिलाफ कडुवे तरीके से बोल रही हूँ | किन्तु मेरी भावनाएं साफ़ हैं | मैं  समाज में निहित भ्रष्टाचार के खिलाफ हूँ ( आप भी होंगे पूरा यकीन है ) और आज गणतंत्र दिवस पर चाहती हूँ कि सभी लोग इसके खिलाफ हो जाएँ |
                                                   न घूस लें न दें | संकल्प लें |
 
                  campaign1
 
   *=====*=====*=====*=====*=====*=====*=====*=====**=====*=====*=====*
क्या ये सब पढ़ कर भी इन भ्रष्टाचारियों की आँखे नहीं खुलेंगी | क्या हमारा प्यारा भारत देश, इन बीमार, लचर, भ्रष्टतंत्र से मुक्त हो कर, सही मायनों  में आजादी की खुली साँस ले सकेगा | क्या हम सब एक जुट हो कर इसके खिलाफ आवाज नहीं उठा सकते | मेरा सरोकार किसी आन्दोलन से नहीं बल्कि  अपने कर्तव्यों का पालन से है हम जहाँ भी कार्य करते हैं अपने कर्तव्यों का पालन इमान् और निष्ठापूर्वक कर  अपने देश को गौरवान्वित कर प्रगतिशील बना सकते हैं |

  *=====*=====*=====*=====*=====*=====*=====*=====**=====*=====*=====*
दो    जोक – अभी अभी बनाएं
मम्मी – राज बेटा ! लड़की वालों को देखने जा रहे हैं | खूब पैसे वाले हैं | जरा हमारी अच्छी छाप बन जाये | ढंग से तैयार होना |
राज – जी मम्मी! मैं तैयार हो गया हूँ पूरी तरह से | चलिये
मम्मी – अरे रुक , तुने प्याज वाला इत्र तो डाला ही नहीं |
 
                                                                 *-*-*-*-*
 
ग्राम प्रधान ( नेता जी से ) – साहेब पिछली गरीबी उन्मूलन के लिए जो पैसे आये थे, आपने पूरे डकार लिए थे| अब मनमोहन जी गाँव भ्रमण में आ रहे है | क्या करूं?
नेता जी – ये लो ये एक शीशी  ,मैंने ये प्याज के इत्र अपने भण्डार में जमा किये हुवे हैं, ठीक समय पे इस एक शीशी से  तुम  गाँववासियों पर एक एक पफ्फ़ छिडक देना|
                                              डॉ नूतन गैरोला - २६ जनवरी २०११
  *=====*=====*=====*=====*=====*=====*=====*=====**=====*=====*=====*
और अंत में अपनी
प्यारी भारत माता की जय
                   जय हिंद - सभी का गणतंत्र दिवस अच्छा रहा होगा | इस उम्मीद के साथ
 
         imagesCABCV93S
              
       लहर लहर ओ
भारतीय राष्ट्र पताका
तू आज गगन को छू ले |
( ये पंक्तियाँ स्कूल के दिनों में गाये देश भक्ति के गीतों में से हैं जो मुझे पसंद था |)
 
 
  सभी फोटो गूगल से सभार
 

Thursday, December 30, 2010

क्यूंकि वह वहसी दरिंदा था - डॉ नूतन गैरोला

एक निरीह बेजुबान को  किस तरह एक चतुर दरिंदे के आगे उसके अभिमान के लिए अपने प्राणों को गंवाना पड़ा या बेघर होना पड़ा .. और यह कोई नहीं जानता की वह इस दुनिया में है भी की नहीं ? 
 
 
                                        
 
 
वह वहसी दरिंदा था | उसकी पूंछ थी जो प्रेम में हिलती थी और जब डर जाता तो दब जाती थी | चार नुकीले दांत थे जो खाना कुतरते थे | और जब कोई उसको बहुत धमकाता या तंग करता तो बचाव में डराते भी थे | एक लंबी जीभ थी जो गर्मियों में लटकती थी शरीर को वातानुकूलित करती या प्यार में अपने मालिक और प्रेमी लोगो को चाटने के लिए किन्तु भाषा बोलने में अक्षम सिर्फ गले से भों-भों की आवाज क्यूंकि वह एक बेजुबान कुत्ता था ..
और वह ? उसकी एक पूंछ नहीं थी | आगे के चार नुकीले दांत भी ना थे | ना सर पर सिंग थे | एक मीठी जुबान थी जो समझने सकने वाली भाषा बोलती थी | और एक शातिर दिमाग था, जो समय के हिसाब से अपने बचाव में सच को झूठ में बदलने में सक्षम था क्यूंकि वह एक चालाक आदमजात था | वहसी दरिंदा ?
एक नन्ही लड़की के पड़ोस में वह आदमजात रहता था और उस नन्ही लड़की ने एक बेजुबान कुत्ता पाला था | वह बच्ची उस छोटे से पिल्ले को बहुत प्यार करती और खुद को उसकी मम्मी कहती और अपनी मम्मी को उस पिल्ले की नानी | पिल्ला भी जब अपने घर के सदस्यों के चारों ओर उछलता रहता और आने जाने वालों को खूब प्यार करता | उसकी खूबी थी की वो दो पैरों पे खड़े हो कर नमस्ते नमस्ते करता कभी बोलने का भी प्रयास करते हुवे अपने मालिक की भाषा का नक़ल करने की पूरी कोशिश करता |
    अब पिल्ला कुछ कुछ बड़ा होने लगा और पिल्ले से एक प्यारा कुत्ता बनने लगा | जब लड़की ट्यूसन जाती तो वह भी पीछे जाता और घर आ कर दरवाजे पर उसकी इन्तजार करता| सुबह का घूमना भी खुद करता, घर से बाहर जाता तो पांच मिनट में घर आ जाता | लेकिन इस बीच अचानक वो छोटा कुत्ता जो कि अब लगभग एक साल का हो चला था रात को घूमते समय गायब हो जाता .. नन्ही लड़की आवाज लगा लगा के थक जाती पर कुत्ता वापस ना आता | फिर सुबह वहीं पर पूंछ हिलाता हुवा दिख जाता | घर वाले परेशान हो जाते की वह कहाँ गायब हो जाता है | एक रात को जब कुत्ता गायब हो गया तो घर वाले ढूंढते ढूंढते परेशान हो गए, तब एक पहचान के लड़के को कुत्ते को ढूंढने भेजा .. काफी जद्दोजहद के बाद वो कुत्ता मिल गया .. वो भी अप्रत्याशित रूप से ..जब उस लड़के ने तथाकथित आदमजात की रजाई खींची तो वो कुत्ता उसके पैरों के बीच में दबा हुवा मिला और उस बेजुबान कुत्ते के मुँह को उस आदमजात ने कस के दबाया हुवा था ताकि वो आवाज ना निकाल सके | कुत्ता बेहद डरा हुवा था, उस लड़के ने उस कुत्ते को आदमजात से छुडाया और घर लाया गया | ऐसा दो तीन बार हुवा की कुत्ता उस आदमजात की गिरफ्त में होता
               |अब दिसम्बर के महीने में वो एक साल का हो चला था | दिसम्बर को जिस दिन उसका जन्मदिन था, जाड़ा ज्यादा था वो लड़की उस कुत्ते के लिए कोट ले आई | कभी घर में कोई उस नन्ही लड़की को पढाने या शैतानी में मारता तो वो कुत्ता रोता और मारने वालो को गुस्से में दांत भी दिखाता | घर वाले कुत्ते से नाराज हो जाते कि यह तो हमें दांत दिखा रहा है | कुत्ता कुछ चिडचिडा हो चला .. खास कर वो आदमजात आता तो चिढचिढाने लगता | और एक अजीब सी तीखी चिढचिढ़ी आवाज में चिल्लाता | और वो आदमजात भी दिन में कहता कि इसे संभालो ये मुझसे चिढता है | फिर ऐसा हुवा कि उस लड़की के माँ पिता जी को बाहर जाना पड़ा तब फिर अचानक दो रात को कुत्ता गायब हो गया .. दिन में घर होता और रात को अचानक गायब ..उस दिन कुत्ता एक साल और आठ दिन का हुवा था, सुबह जब कुत्ता घर में था वो आदमजात उनके घर आया और कुत्ते पर हाथ लगाने लगा तो कुत्ता दूर हो कर गुर्राया तो आदमजात ने उसे एक लात मारी.. कुत्ता अचानक भड़क गया .. और एक खरोंच उस आदमजात पर लग गयी.. और फिर आदमजात ने क्रोध से उस कुत्ते को देखा और कहा देख लेना तुझे अब बताता हूँ .. लड़की ने सोचा मजाक होगा ..फ़ौरन आदमजात के लिए टीके लाये गए और टीका लगाया गया ..
                     किन्तु थोड़ी देर बाद ध्यान गया फिर कुत्ता गायब हो चूका था, शाम तक जब ढूंढने पर भी कुत्ता नहीं मिला तो वो नन्ही लड़की घर की छत से उस कुत्ते को आवाज लगाती रही.. बहुत रोई जब याद आया कि आदमजात ने कुत्ते को धमकी दी थी ..फिर उसने अपनी माँ को फोन किया पर वहाँ से हजार किलोमीटर के फासले से माँ क्या बताती या करती | रात भर रोते रोते लड़की की आँखे पकोडा हो गयी..अगले दिन भी कुत्ते की खोज की गयी.. तब पता चला की वह आदमजात कुत्ते को ट्रक के नीचे ३-४ बार फैंक कर मारने की कोशिश कर रहा था जो कि वहाँ पर खड़े लोगो ने देखा और बताया .. फिर जब ट्रक के नीचे नहीं आया तो कंधे में उठा के उस कुत्ते को कहीं ले गया और कुत्ता यह सोचता रहा कि शायद घुमाने ले जा रहा है .. और उस दिन के बाद वो कुत्ता कही नहीं नजर आया .. शायद उसे पास बहती नदी में फैंका गया, या फिर किसी दूर गाड़ी के नीचे कुचल कर पहाड़ी से नीचे फैंका गया .. या फिर किसी ट्रक में डाल कर दूर किसी और शहर में बेघर कर दिया गया .. उस लड़की के प्राण छटपटा रहे थे कि मेरे बेटे का क्या हुवा .. मेरा बेटे मेरे प्यारे  कुत्ते ने ऐसा क्या बिगाड़ दिया था कि उसे इस कदर मार दिया गया ..हर आहट पर उसे लगता था कि उसका प्यारा कुत्ता वापस उसकी बाट जोह रहा है और उस लड़की की आँखों से आंशू धार धार बह कर जमीन को भिगोते रहे कि कोई तो मेरे उस बेटे को वापस कर दे और जब उस आदमजात से पूछने की कोशिश की गयी तो उसने बात करने से इनकार कर दिया और फिर अचानक नन्ही लड़की के घर फोन कर कहा कि आप मुझसे पूछने की कोशिश ना करें , मैं अगर आत्महत्या कर दूँ तो इल्जाम आप पर चढ जायेगा, आप मुँह बंद रखें | आदमजात की क्रूरता और चालाकी देखे नहीं बनती थी | एक बेजुबान पर कितना भी जुर्म हो किन्तु अगर वह इसका विरोध करे तो क्या उस को अपने प्राण की आहुति दे कर इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी ?


वह मारा गया क्यूंकि वह वहसी दरिंदा था -आपका मानना क्या ?  वहसी दरिंदा कौन ? वह कुत्ता या वह आदमजात |


Sunday, November 14, 2010

हम भी कभी बच्चे थे | बाल दिवस के अवसर पर |

बच्चे छल कपट से दूर भगवान का नन्हा रूप है और किसी भी समाज और देश का आधार हैं |आज का बच्चा कल का नागरिक है देश का सूत्रधार है | माँ पिता का सहारा है |  बचपन के इस रूप को ,चिल्ड्रेंस डे - बाल दिवस के रूप में  विश्व भर में अलग अलग तारीखों में मनाया जाता है | इंटरनेशनल – अंतर्राष्ट्रीय बाल दिवस १ जून को, यूनिवर्शल – विश्वव्याप्त बाल दिवस  नवंबर  २० तारीख को मनाया जाता है | किन्तु हमारे देश भारत में बाल दिवस बड़ी धूम-धाम से १४ नवम्बर को मनाया जाता है ..कारण.. इस दिन देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु का जन्मदिन है जो कि बच्चो को बेहद प्यार करते थे और बच्चे भी उनेह बहुत प्रेम और सम्मान देते रहे ..वो बच्चो के प्रिय चाचा नेहरु थे | उनकी मौत के बाद 1964 से उनकी  जयंती  “ बाल दिवस “  के रूप में मनाई  जाती है चाचा नेहरु को हमारी श्रधांजली और बच्चों को प्यार |

childrens-day-celebration

बचपन के संस्मरण

आज बाल दिवस पर मैं अपने बचपन के एक दो किस्से आप सभी से शेयर कर रही हूँ |
 क्यूंकि हम भी कभी बच्चे थे |


माथे का  दाग -


                    Crying, for a Child in War
बालमन - कहीं देखा सर्कस में रस्सी पर झूलती लड़की- मैंने चाहा की मै भी उस लड़की के जैसा कारनामा करूँ| तब में LKG में पढ़ती थी | उम्र लगभग तीन साल से चार साल के बीच | माँ ने हम दोनों बहनों को तैयार किया स्कूल जाने के लिए | मेरी कंघी पहले की और छोटी बहन के वो बाल बना ही रही थी कि मै बाहर बरामदे में आ गयी | ८-१० सीढ़ी  नीचे सड़क थी और  बरामदे में एक गोल स्तंभ था | उस स्तंभ के पास खड़ी नीचे सीढियाँ को देख जाने क्यों वो सर्कस के करतब याद आये .. और अपने ऊँगली में मैंने बदरीनाथ भगवान की अंगूठी देखी सोचा क्यों ना इसे खम्बे में अटका कर झूला झूलूँ  जोर जोर से जैसे सर्कस में  हतप्रभ करने वाले करतब देखे, उनकी तरह  | और मैंने अपनी ऊँगली सीधी  की और अंगूठी को खम्बे में फ़साने का जत्न करते हुवे लटक गयी और झूलने लगी - अरे ये क्या ! मै तो धडाम से उंचाई से १० सीढ़ी नीचे गिर पड़ी | सीधे  सीढ़ी के कोने से सर जा टकराया |जाने क्यों दर्द नहीं हुवा मुझे | सड़क पर आते जाते लोग ठिठक गए | और मैंने चाहा दिखाना कि मै कोई छोटी बच्ची नहीं हूँ | सीधे खड़ी हुवी और  सीढ़ी की ओर मुडी |सीढ़ी चढ़ने लगी कि नजर गयी ऊपर वाली सीढ़ी पर जहाँ पर मेरे सर से खून का फव्वारा झड रहा था |माथे के बायीं ओर से तेज खून की  धारा फव्वारे के रूप में निकल रही थी| तब तो चोट की डर नहीं माँ की डांट के डर से सिहरन उठने लगी | दरवाजे से अंदर पहुंचते  ही माँ ने मेरे चेहरे की जगह बहती खून की धारा देखी तो घबरा गयीं | हाथ से उन्होंने मेरा माथा दबाया पूछा ये क्या हो गया , कैसे हो गया .. बड़े भाईसाहब को आवाज लगाने लगी | एक साफ़ साडी को चीर कर माथे पे पट्टी बाँधी भाईसाहब और माँ ने | छोटी बहन थी घर में और माँ ने किचन में खाना भी चढाया था अतः भैया को आवश्यक हिदायत दे कर खुद मुझे गोद में ले बहुत तेज क़दमों से पास के क्लिनिक, जो की शायद आधा किलोमीटर दूर था ले गयी|
मैं माँ की गोद में थी और मेरा सर माँ के कंधे पर था, माँ के खुले बालो से टपकता खून मुझे आज भी दिखाई देता है| दौड़ती भागती माँ डॉक्टर के पास पहुची तो डॉक्टर किसी अन्य केस में व्यस्त था  और मेरा इलाज शुरू होने में  देर हो गयी | जब मेरा नंबर आया तो डॉक्टर को टांके मारने /सिलने के लिए सुई ही नहीं मिली | और कहा कि सुई  लाने तक बच्ची के शरीर से काफी खून बह जायेगा| अतः उन्होंने मेरे घाव की पेकिंग कर दी और ऊपर से पट्टी कर दी | जिसकी वजह से उस समय मेरा खून तो रुक गया पर मेरे माथे पर एक गहरी चोट का निशान रह गया |अब आई पूछताछ की बारी, जब शाम को घर पे पूछा गया कि कैसे गिरी | मेरी गिग्घी बंध गयी| ऐसा लगा कि इस तरह से झूला झुलना और मूर्खता करना अपराध था |जाने कौन सा भय मुझे कचोटने लगा कि मार अब पड़ी तब पड़ी|
          और भय में मैंने अपने को बचाने की एक युक्ति निकली | कह दिया किसी ने मेरा हाथ खिंचा था | ये कहना क्या था कि माँ डर गयी | बोली किसने खिंचा था बता | याद कर | कहने लगे सूरत किस से मिलती जुलती थी | अब तो झूठ  बोल चुकी थी अब बचने की और सूरतें भी खतम हो गई| कह दिया कोई  देखा देखा सा है | पूछा किसके जैसा उस बच्ची ने कहा दूध वाले के बेटे जैसा | बोला कि झूट तो नहीं बोल रही है | वैसे झूठ बोलना आदतों में सुमार ना था| झूट बोला मैंने कांपते दिल से| कुछ कुछ उसके जैसा था | नहीं चाहती थी कि बात आगे बढे पर बात थी कि रुकी नहीं | और उस छोटी बच्ची को अगले दिन दूध वाले के घर ले जाया गया | धुंधली यादें है कि आँगन में उनके बच्चे खड़े थे और मैं माँ से चिपकी रो रही थी अब डर था कि उन बच्चो को मेरी वजह से मार न पड़े | जब जब वो पूछे की पहचानो मैं और डर कर जोर जोर से रोने लगती | आखिरी में दो तीन बच्चो के बीच मैंने कहा कि इनके जैसा था पर ये नहीं और उन बच्चो को भी राहत मिल गयी |
        उस दिन का वो झूठ जो अनायास  बोला, मै जिंदगी भर झूठ बोलने से डर गयी | तीन साल की थी डर ऐसा व्याप्त था कि इसे कभी भुला नहीं सकी | मै खुद को उन बच्चो का गुनाहगार मानती रही और ये सर की चोट सदा याद दिलाती रही हादसे की और आज भी मुझे झूठ से सख्त नफरत है |


दीदी का खून पीते तो मोटे होते |


                  imagination
ये जो माथे की चोट का संस्मरण लिखा मैंने, उसी सन्दर्भ में - मेरी छोटी बहन ने ऐसा खून बहते कभी नहीं देखा | शायद डरी होगी, किन्तु रात को जब पिता जी ड्यूटी से घर वापस आये तो माँ ने उन्हें मेरे बारे में बताया | मेरे सर पर लगी चोट देख कर वो बहुत व्यथित और दुखी हुवे | और मुझे गोद में ले कर बैठ गए| तभी छोटी बहन पीछे से दौड़ती हुवी आई और पिता जी पर लिपट गयी | बोली पिता जी | आप दिन में क्यों नहीं आये | दीदी को चोट लगी थी | कितना खून बहा - उसने हाथ फैला कर कहा इत्नाआआ साअराआअ बाल्टी भर के| आप होते तो आप कितना खून पीते और कितने मोते हो जाते | खून पीते ?? पिता जी की एक नाराजी से भरी  थपकी उसके सर पर - याद है


  मुर्दे की खीर 


               crying_child

बचपन कितना सरल और भोला होता है..झूठ सच नहीं जानता || जिसने जैसा बताया मानता है  | विस्मित होता है किन्तु विश्वास करता है  क्यूंकि उसके लिए दुनिया की हर चीज नयी और विस्मय से भरी होती है |

एक रोज घर में, छुट्टी पर पिताजी और सभी  थे | किन्तु दिन में  ( र ) भाईसाहब जी, जो कि तब पांच साल के रहे होंगे बाहर खेलने गए |थोड़ी देर बाद किसी बच्चे कि हृदयविदारक चीख और रोने कि आवाज से सब चौंक गए | भाईसाहब (र) रोते हुवे घर आ रहे थे | उनका मुँह खुला का खुला था | पिता जी ने कहा, क्या हुवा ? क्यों रो रहे हो ? किन्तु भाईसाहब और जोर जोर  से रोने लगे - बेहद भयभीत थे और उनका सारा शरीर अकडा हुवा था पिता जी ने जैसे ही  (र) को छुवा वो पैर भी पटकने लगे | सब घबरा गए कि कही सांप ने तो नहीं काटा होगा ? क्या हुवा होगा ? पूछते रहे पर वो सुन भी नहीं रहे थे, अब तो मुँह  भी खुला था और पैर भी पटक रहे थे  और पूरा शरीर ऐंठा जा रहा था और डर से पसीने भी छूट रहे थे - पिताजी ने फिर गुस्से में कहा  ताकि वो अपनी समस्या के बारे में बताएं  बोल क्या हुवा | तो (र)भाईसाहब  के मुंह से एक वाकया फूटा – “ मुर्दे की खीर “ |मुर्दे की खीर जैसे शब्द  से सभी नावाकिफ  थे, सब घबरा गए - भैया ने बाहर की तरफ इशारा कर के बताया मुर्दे की खीर | बहुतेरी कोशिश की गयी कि वो बताएं कि क्या हुवा उनके साथ  ..लेकिन डर के मारे उनका शरीर  अकडा हुवा था बस अब एक ही शब्द बोल कर चिल्ला रहे थे - मुर्दे की खीर - फिर एक जोर की थपकी पडी गाल पे | एक दम भाईसाहब को होश आया | माँ भी बोली कि  बताओ क्या हुवा क्यों इतना रो रहा है | भाईसाहब ने बाहर इशारा किया मुर्दे की खीर और डर के मारे माँ की गोद में छुप गए जैसे अब मुर्दे की खीर से कोई अनर्थ होने वाला है और चिल्ला रहे थे मुझे बचाओ |
               पिता जी बाहर गए कुछ बच्चे  वहाँ पर भयभीत थे | पिता जी ने उनसे पूछा क्या बात है बच्चो क्यों डर रहे हो | तब एक बच्चा फटी फटी आँखों से बोला अंकल जी, अभी यहाँ से लोग एक मुर्दे को उठा कर ले जा रहे थे और  उस पर चावल डाल रहे थे |
                   तब पिता जी ने सड़क पर देखा तो बहुत चावल के दाने फैले हुवे थे | चावलों को देख पिता जी ने  कहा तो क्या हुवा चावल के दानो से ? बच्चो ने बताया की एक बहुत बड़े भाईसाहब यहाँ पर खड़े थे उन्होंने कहा की बच्चो ये चावल के दाने मुर्दे की खीर हैं | ये मुर्दे का खाना है | इस लिए इस बात का ख्याल रखना कि इस पर पैर न लगे नहीं तो मुर्दा उस बच्चे को खा जायेगा  | ( किसी ने बच्चो के साथ मजाक की थी ) बच्चों ने बताया कि उस समय वो लोग सड़क के उस  पार खड़े थे | सड़क को पार करने के लिए उन्हें बहुत मेहनत करनी पड़ी | एक एक कदम उन्होंने सड़क पर बैठ बैठ कर चावल के दानो को देख कर कर रखा जो कि बहुत कठिन था | किन्तु बेचारे ( र )का पैर एक चावल के दाने पर छू गया था ..उसके साथ रास्ता पार करते उसके दोस्त (म ) ने भी देखा | म चिल्लाया और र घबरा गया वह चीखता हुवा  घर भागा |बच्चे बोले - अंकल  हमने तो सड़क पार कर दी पर र का अब क्या होगा?  पिता जी के हँसते हंसते बुरे हाल हो गये | किन्तु र भाईसाहब को मुर्दे की खीर के भय से आजाद करने में समय लगा |

घटना के समय मैं बहुत छोटी थी | जो सुना वो बताया |
 
बुढ़िया और झोपड़ी

जब मैं छोटी  थी -मेरी बचपन में लिखी एक कविता |


 
               teenage
अरे ! वो जलते दीये
किसने बुझा दिये हैं ?..
वह वृद्धा उस झोपडी में
उस घुप्प अन्धकार में ?
जिसने कल्याण किये हैं ..||


वो अट्टालिका वो इमारते
जगमगाती रोशनी है जिसमे,
असंख्य विद्युत बल्ब हैं , पराया
रक्त चूस कर जिसमें ||


वह वृद्धा उस अन्धकार में
उठती कुछ टटोलती |
गोद में ले एक रोग पीड़ित
परोपकार का बच्चा ||


उठती वह खांस कर,
कुछ कदम लड़खड़ा कर |
वापस लौट आती है वो
इमारत में झाँक कर ||


आज अब वो झोपड़ी
निरंग और सुनसान है |
बुढ़िया का न बच्चे का
उस झोपड़ी में कहीं
नाम और निशान है ||


काश !ऐ इमारत वालो तुम में
कुछ दया भाव होता |
तुमने बंद खिड़की को खोल
कुछ प्रकाश पुंज बिखेरा होता |
तो आज इस धरती पर एक
पवित्र आत्मा का तो निवास होता ||


द्वारा .. Miss Nutan Dimri / डॉ नूतन गैरोला


यह कविता मै, जब १५ साल की थी, तब लिखी थी 
पुरानी डायरी के पन्नो से उतारी है |
और डायरी के वो पेज भी मैंने फोटो में डाले हैं 
पुराने यादे - कविता बचपन की  


 बाल दिवस पर हार्दिक शुभकामनायें और बधाइयाँ

 


99galleries.com | Forward This Picture To Your Friends

Sunday, October 31, 2010

पहाड़ / उत्तराखंड/ गढ़वाल ( गाँव ) की एक दीपावली - २००९ Dr Nutan Gairola

  पहाड़ / उत्तराखंड/ गढ़वाल ( गाँव ) की एक दीपावली - २००९

घर की सफाई, रंग-रोगन कुछ दिन पहले से शरू हो जाता है | फिर दीपावली के दिन सुबह सवेरे स्नान ध्यान के बाद बनती हैं फूल मालाएं | बच्चे लोग फूलों की मालाएं बनाते है और दीये के लिए बाती | माँ पिता घर की सफाई करते है और रसोई में बनती है -पूड़ी पकौड़ी .. इसके साथ ख़ास बनता है " पिण्डा " - पिण्डा गाये, बैल, बछिया को खिलाने के लिए पके हुए  चावल / भात , झंगोरा / ज्वार और आटे का हाथ से बनाया हुआ बड़ा बड़ा लड्डू होता हैं | पिंडों की थाली भी विशेष रूप से सजाई जाती है| हर पिण्डे पर एक फूल ( अक्सर गेन्दा ) रोपा हुआ  होता है |गाय की पूजा की जाती है| फूल मालाएं पहनाई जाती हैं | तिलक लगा के उनके सींगों पर तेल या घी की मालिश करते हैं .. और फिर उन्हें  " पिण्डा" खिलाया जाता है |


गौ पूजन और पिण्डा खिलाते हुए 


दरवाजों/ देल्ली  के चौखटों को और लकड़ी के खम्बों को सुन्दर पीले, लाल और सफ़ेद रंगों से क्रमशः हल्दी, रोली और आटे के बिंदियो से सजाते ( बिर्याते ) हैं | दरवाजे के दोनों कोनों पर थोडा सा गोबर लगा कर उसे रंगों से बिर्याते है और जौ से सजाते है व दरवाजे और पूजा घर को फूल मालाओं से सजाते है |

दिन में लडकियां और महिलाएं घर की सजावट में गेरू से रंग कर, पिसे चावल से रंगोली सजाते है | रंगीन मिट्टी भी कहीं कहीं पर इस्तेमाल करते है | या फूलों की रंगोली भी  और लक्ष्मी के पैरों के निशान घर के बाहर से भीतर जाते पूजाघर या अनाजघर तक जाते हुवे अंकित करते हैं |




दीये से सुसज्जित रंगोली, पूजा और घर



शाम को पूड़ी ( स्वाल ), पकौड़ी, हलवा बनता है| लजीज व्यंजन बनाये जाते है | पानी की धारा ( मंगरा ), हल के फल और जोल की व ओखली और मुसल ( गंज्याला ) को भी सजाया/ बिर्याया जाता है | इनकी पूजा की जाती है क्यूंकि किसानों के लिए गाय बैल हल, पानी और अनाज को कूटने वाला ओखल बहुत महत्वपूर्ण हैं |

पूड़ी, पकौड़ी, खील, बताशे, मिठाइयाँ और दीयों के थाल सज जाते है| पूजा की सामग्री के साथ पैसा या जेवर, सोना आदि भी रखा जाता है | गणेश जी और लक्ष्मी जी की पूजा होती है |



 जगमग दीये और गणेश लक्ष्मी की पूजा



फिर दीप मालाएं सजाई जाती हैं | घर का कोना कोना दीपज्योति से जगमगाने लगता है| आज कल फुलझड़िया, अनार, बम-पटाखे भी फोडे जाते है |






फूलझड़ी, अनार जलाते हुवे बच्चे 




किन्तु गाँवो में भेल्लो / भेलो खेलते है | जिसमें लकड़ियों का एक छोटा गट्ठा बाँध कर घुमातें हैं | गाँववासी इसका बहुत आनंद लेते है | दुसरे गाँव वाले भी, और सभी गाँव से बाहर इकठ्ठा हो कर नाचते हैं  और रोशनी का त्यौहार भेल्लो के साथ मानते है और " भेल्लो रे भेल्लो " गीत भी गातें हैं |




पारंपरिक भेल्लो खेलते हुए 



घर में बनी पूड़ी, पकौड़ी , खील- बतासे, मिष्ठान आदि का आदान प्रदान करतें हैं और दिवाली मिलन करते है | बच्चो को ये त्यौहार खासा पसंद आता है |

 दीपावली पर हार्दिक शुभकामनाएं  

आप सभी का त्यौहार मंगलमय हो | खुशियों को लाने वाला, मन के अंधेरो, राग द्वेश को मिटाने वाला और आपसी प्रेम को बढाने वाला हो | दीपमालाएं प्रज्वलित कीजियेगा किन्तु नाहक बारूद को जला जला कर वातावरण प्रदूषित न किया जाये तो हम सबके लिए और हमारी पृथ्वी के लिए बेहतर होगा | आग से, बारूद से बचें और एक सुरक्षित, पर्यावरण संरक्षित और सौहार्दपूर्ण दीपावली मनाएं -

                  शुभकामनाएं सहित - डॉ नूतन गैरोला

     सभी फोटो मेरी निजी एल्बम से सिर्फ आखिरी फोटो को छोड़ कर - डॉ नूतन गैरोला

Wednesday, October 20, 2010

मेला कर्फ्यू का --एक पहाड़ी लघुकथा - Dr Nutan Gairola

यह कहानी सत्य  घटना  पर  आधारित  है | ये घटना तब की है जब उत्तराखंड आन्दोलन होने पर कर्फ्यू लगा दिया गया था | मैंने उसका विस्तार अपनी सोच से किया है पर मूल में सच्चाई है..पहाड़ की एक सीधी साधी  वृद्ध महिला कर्फ्यू लगा है, कर्फ्यू एक मेला   होता है ऐसा समझ -----                                   

  
पहाड़ के लोग सीधे साधे .. और तब और ज्यादा जब  कि वो दूर-दराज के रहने वाले हो -- ऊपर से जब कोई वृद्धा की बात हो | ऐसी ही एक सीधे साधे पहाड़ी वृद्ध माता ( रुक्मा - काल्पनिक नाम )  की बात  लिख रही हूँ .. ,, बात तब की है जब उत्तराखंड आन्दोलन जोर पे था  | पहाड़ में माहोल बहुत शांतिमय रहा करता था .. लोगो ने दंगा फसाद नहीं जाना ना देखा था ... और फिर कर्फ्यू का क्या मतलब ? लोग गाँव के खेती किसानी में  व्यस्त और कभी मेला ठेला  होता तो वहां चरखी में घूमना .. सर्कस देखना .. तब चाट गोलगप्पे खाना .. रंगबिरंगी चूड़िया पहनती महिलाये, बालों के लिए  चुटिया खरीदती .मेले में बिकते  बुडिया के बाल खाती ...यही मौका होता जब काम से दूर सहेलियों के साथ हंसी  ख़ुशी मनाते..  या फिर कही देवी भाग्वत होता, कथा प्रवचन होता तो खेत से आने के बाद नहा धो कर कथा सुनने जाते और प्रसाद पा कर धन्य हो जाते ...
                                                ऐसे भोले भाले लोग जिन्होंने टेढ़ी बात देखी ना सोची, ... एक दिन वहां के छोटे छोटे शहरों  में कर्फ्यू का ऐलान हो गया | लोग घरों  में बंद .. रुक्मा  विधवा वृद्धा .. खेतों में काम करते समय बातो बातों में सुना कि आज शहर में कर्फ्यू लगा है |जैसे कोई मेला लगा हो | रुक्मा  ने पूछा  अन्य  महिलाओ से कि ये कर्फ्यू क्या होता है... महिलाओं ने बताया कि हमने सुना है पर देखा नहीं... सुना है उधर शहर में जाने नहीं दे रहे है... रुक्मा के मन में भाँती भाँती की मिठाइयों की दुकाने,  झूले , प्रदर्शनी, मेला ,सर्कस, कथा  प्रवचन घुमने लगे .. शायद कर्फ्यू ऐसा ही कुछ होता होगा .. फिर उसने पूछा कि कोई मेरे साथ कोई चलेगा देखने .. वहां  पर काम करती महिलाओं ने कहा बच्चे अभी घर पर  रो रहे होंगे हमें तो घर जाना जरूरी है .. घर गए तो फिर बाजार नहीं जा सकेंगे .. देर हो जाएगी .. गाँव खेत से दुसरी तरफ है शहर  बाजार दुसरी तरफ .. फिर उन महिलाओं ने मिल कर वृद्धा को कहा -बोडी ( ताई ) तू चली जा ना - घर में कौनसे कोई तेरा इन्तजार कर रहा है.. और बताना कैसा था कर्फ्यू .. कल हम भी साथ चलेंगे .. आज कपडे भी अच्छे नहीं पहने हैं .. . रुक्मा जो गाँव के सहयोग में आगे रहती थी सोचा कि चलो आज मैं चली जाउंगी ..कल इन लोगो के साथ मैं फिर चली जाउंगी... और फिर रुक्मा ठहरी अकेली घर में, बच्चे भी बहुत दूर कहीं देश ( पहाड़ से दूर ) में .. कोई पूछने वाला भी नहीं.. सो वह कथा प्रवचन , रामलीला , मेले में जाना पसंद करती .. इस तरह से वो अपना बुडापा काट रही थी |
                                 रुक्मा शहर की ओर चली | खेतों को पार करके जंगल और फिर शहर  की ओर जाता तीखा ढलान | ढलान को पार कर के वो जंगल के दुसरे छोर  जा  निकली ... वहां स्कूल को पार किया तो किसी ने पूछा माता जी कहाँ  जा रही हो ? वह बोली बेटा कर्फ्यू देखने जा रही हूँ | व्यक्ति बोला वहां  मत जाना ..मनाही है पुलिस  भी लगी है | ठीक है बेटा ..  मैंने तो कोई अपराध नहीं किया मुझे क्यों पुलिस पकड़ेगी ..पुलिस का कुछ नहीं बिगाड़उंगी | किसी का बुरा नहीं करुँगी .. चुपके से कर्फ्यू देख कर लौट आउंगी ..
                          बुडी रुक्मा पुलिस और कर्फ्यू का आपसी सम्बन्ध न  समझ पाई | ये आखिरी ढलान थी जहाँ  दोनों ओर बेतरतीबी से बिखरे पहाड़ी शहर के मकान थे | खिड़की से एक औरत ने आवाज लगायी - ए बड़ी जी  ( ए ताई जी ) कहाँ  जा रही हो ? वहां मत जा बडी- पुलिस लगी  है | बड़ी( रुक्मा )  ने कहा सिर्फ कर्फ्यू देखने जा रही हूँ | महिला बोली बड़ी हिम्मत है - लोग तो नहीं जा रहे |
            रुक्मा ने सोचा एक तो आज तक कभी कर्फ्यू नहीं लगा यहाँ " पहली बार लगा है .. कैसे सोये लोग हैं ये जो मेला तो देख लेते है जो साल में दो बार लगता है...और कर्फ्यू पुलिस की डर से नहीं देख रहे है ...पुलिस वाले भी तो हमारे बेटे ही है... गाँव का रग्घू भी तो पुलिस वाला है ... कितना अच्छा बच्चा है ...  और फिर मैंने तो पूरी उम्र ही बिता  दी पर कभी कर्फ्यू नहीं लगा .... इतना ख़ास है ये कर्फ्यू - सुना है कि बाहर से पुलिस  भी आई है... फिर क्यों ना देखें - कल तो मेरे गाँव की महिलायें भी आएँगी -
                  रुक्मा बाजार पहुँच  गयी - अरे ये क्या ?  बाजार बंद है लोग भी नहीं दिख रहे है... रुक्मा सोचने लगी -- हाँ~~~~ ये कर्फ्यू का कमाल है |  इतना सुन्दर प्रोग्राम होगा तो सभी दुकाने बंद कर कर्फ्यू देखने गए है.. रुक्मा तेज़ी से कदम बड़ा कर कर्फ्यू वाली जगह ढूंढने लगी | तभी एक पुलिस वाले की कर्कश आवाज कान में गूंजी - ऐ बुडी कहाँ  जा रही है - रुक्मा बोली - बेटे ! कर्फ्यू देखने - कहाँ  है वो ? पुलिस वाले ने और सख्त और कर्कस आवाज में कहा - चुपचाप घर फौरन चली जा | जाउंगी जाउंगी .. पुलिस वाला बोला ठीक है | रुक्मा तेज कदम से आगे बढने लगी  पुलिस वाला भी दुसरी राह हो लिया... रुक्मा सोच रही थी इतनी दूर से थक हार के यहाँ आई हूँ अब ऐसा कैसे हो कि कर्फ्यू ना देखूं | फिर कोई बताने वाला भी नहीं कि कहाँ  पर कर्फ्यू का पंडाल सजा है | .. थोड़ी दूर पर एक पुलिस वाला दिखाई   दिया रुक्मा सड़क की दुसरी तरफ जाने लगी तो पुलिस वाला बोला - माता जी कहाँ  जा रही हो - वापस घर जाओ -  रुक्मा बोली कर्फ्यू देखने - पुलिस वाला बोला क्या मजाक है - सीधे सीधे वापस जा - रुक्मा  बोली नहीं जाउंगी - कर्फ्यू  कहाँ है ? कैसा होता है ? सब लोग कर्फ्यू देख रहे है यहाँ ..आज तो मैं कर्फ्यू देखे बगैर नहीं जाउंगी| पुलिस वाले ने कहा कहना नहीं मानेगी तू ... और यह कह कर एक बहुत तेज़ डंडे का  वार रुक्मा  की पीठ पर कर दिया | रुक्मा  पीड़ा से चिल्लाई .. दर्द से करहाते हुवे बोली यह क्या है क्यों मारा तुने  ? पुलिस वाला बोला यही कर्फ्यू है अब ले कर्फ्यू का मजा यह कह कर उसने रुक्मा  के पैरों पर तेजी से डंडे के प्रहार किये ... रुक्मा का  बुड्ढा शरीर इन अप्रत्याशित वारों को झेल ना पाया -एक तीखी चीख के साथ उसकी उसकी आवाज गले में फंस गयी ...  उसकी आँखों  के आगे अन्धेरा छाने लगा    ........................................    

लेखक - डॉ नूतन गैरोला - २०/१०/२०१०  १८ : ४५  

Thursday, September 9, 2010

" खतरा है - होशियार ! खबरदार " ...एक लेख ..डॉ नूतन

" खतरा है - होशियार ! खबरदार "







नेट -

जी हां - जिसका नाम ही नेट है मतलब कि जाला - जो इस नेट / जाले में गिरा वो फंसा |

चाहे जाल पक्षी को पकड़ने के लिए फैंका गया हो, या फिर जानवर या कीट पतंगों के लिए - जाल पड़ा नहीं कि फंसा |

मैंने मकड़ियो के जालो में फंसे कीड़ो को तडपते देखा है - फंसते चले जाते है जालों के तानो बानो में और मकड़ी के हाथ काल के ग्रास बन जाते है |

पर इन्टरनेट का जाला इन जालो से भी खतरनाक - स्वयं आदमी द्वारा निर्मित - जहाँ आदमी स्वेच्छा से आता है पर हर एक सरल क्लिक के साथ अलग अलग किस्म के जालो में धंसता चला जाता है |

गनीमत है कि वो वहां अटका ही रहे - बड़ी बात कि वो बाहर निकल जाये - लेकिन वो फंसता ही चला जाता है |

ये जाले एक से एक रंगीन तानो बानो का बुना होता है - बड़ा आकृष्ट करने वाला लुभावना होता है

और सजे रहते है विभिन्न सजावटी सामानों से मसलन कि कहीं जानकारियों का अड्डा, कहीं लेख, कही गाने, कहीं चित्र, कहीं मित्र आदि - लेकिन सभी काल्पनिक , जब तक कि हकीक़त में न हो अपने पास - जैसे कि काल्पनिक गाजर का हलुवा का एक चित्र, लीजिये उड़ा लीजिये मजा नेट के मित्रो के साथ लेकिन काल्पनिक

और अगर मानवीय भावनाओं का रंग चढ़ा कर पेश किया जाए तो ? आदमी इस भूल भुलैया में फंसता चला जाता है और हकीक़त से दूर दूर होता चला जाता है |

काल्पनिक संसार की हकीक़त ही में जीने लगता है |

तब सुख दुःख भी वहाँ सुख दुःख के साथी भी वहाँ |

अच्छे साथी मिले तो काल्पनिक संसार कि वास्तविकता में ख़ुशी आ जाती है और वास्तविक मित्रता भी हो जाती है ,

पर ज्यादातर गाजर के हलुवे के चित्र की हकीक़त जैसे - मुखौटो के संग |

ऐसे में मानवीय भावनाओं का शोषण होने का पूर्ण खतरा , मानसिक उत्पीड़न का भय और दिल टूटने की पीड़ा |

इंसान मुक्ति के लिए हाथ पैर पटकता है पर मोह जाल जैसा ये जाला - जाला भी क्या करे उसने तो नहीं कहा था कि तुम आओ, जो अब कह दे कि अब चले जाओ

और कुछ अदद मकड़े आदमी का मुखौटा लगाये तैयार खड़े इस भोले आदमी का निवाला बनाने l बेचारा आदमी, जालों के चक्रव्यूह को तोड़ कर वापस नहीं लौट पाता - ऐसे में मनोचिकित्सक भी क्या ख़ाक करेंगे इस दर्द का इलाज

दवाइयों का सहारा

कांच फर्श पर गिर जाये तो आवाज होती है पर यहाँ तो बिना आवाज के सब कुछ टूट जाता है - लो बैठे बिठाये घर के कमरे में ही मुसीबत |टूट जाती है इंसानी फितरत ,यकीन , रिश्ते - पर नहीं टूटता है तो ये जाला |

जाल और दमकता जाता है नित नए नए रंगों के साथ और हर रोज हजारो नए इंसानी कीड़े इस जाले के अन्दर घुसते है और ये सिलसिला बदस्तूर यूं ही चलता रहता है हर क्लिक के साथ
कुटिल समझदार लोगो के लिए है ये दरवाजा - जो दिमाग से बोलते हैं |
जो दिल से बोलते  हैं  और दुसरे पर भी ऐसा ही यकीन करते हैं, ऐसे सीधे सच्चे इंसान नेट / जाल में बैठे मकड़ों का शिकार हो जाते  हैं | 

" खतरा है - होशियार ! खबरदार "

.....Dr Nutan  .. 09/092010 .. 6:30 A:M








Monday, April 5, 2010

लुत्फ़ बीमारी के..DR Nutan NiTi

हाय रे- जब भी मै रात्री इमरजेंसी करती हूँ .. घर जाती हूँ सुबह का उजाला दिल जला रहा होता है और में गृह कार्यो में अपना हाथ  बंटाने  लगती हूँ फिर दिन की OPD करती हूँ और आते जाते कोरिडोर से वार्ड पर निगाहें जाती है तो मेरा दिल बैठने लगता है ..अभी परसों की ही तो बात है एक नेता जी की बीबी को थोडा सा हल्का बुखार था और सारा हॉस्पिटल दौड़ाया हुवा था ..बाकी के मरीज भी नेता जी के हल्ले के आगे अपनी तकलीफ को हल्का पा रहे थे ... और मै तो उस लुत्फ़ का अंदाजा ले रही थी जो  महोतर्मा साहिबा को मिल रहा था .. हम एक पैर पर उनके सिरहाने पर थे खड़े सर झुकाए ..जैसे कोई गुनाह हमने ही किया हो .. ये बुखार उनको हुवा नहीं मानों हमने दिया हो और अब हम को ही सजा भुगतनी है... हाय रे विधाता ! क्या यही विधान है ..मै इतनी स्वस्थ क्यों ..कब मेरा नंबर आये और हो जाऊं मैं  बीमार .. भगवान् को लड्डू चढ़ाउंगी .. हे प्रभू ! हे दीनो के नाथ !! कुछ तो रहम कर और कर दो हमें भी बीमार .. हो जाये हल्का सा बुखार .. आये एक दो उलटिया .. और हो जाये लाल आँख .. यूं तो हम ज्यादा न हो बीमार पर दिखे जैसे हो हम अत्यंत बीमार .. कुछ साहस हमें भी देना प्रभो कि आये न हमें पर हम चक्करघिन्नी खाए और जहाँ बहुत भीड़ हो वहीँ पर गिर जाये और जमीन पर लोटपोट जाये.. तब क्या आनंद होगा .. हम को भी इधर उधर से लोगो ने पकड़ा होगा.. कोई पंखा झलता होगा .. कोई चिल्लाता होगा हटो हटो ..रास्ता छोड़ो ..लगता होगा कि आये है किसी प्रदेश के मुख्यमंत्री .. और होगा मेरा भी वैसा ही राजसी आव -भगत, सेवा - सुश्रुषा .. कोई निम्बू पानी लाता होगा .. कोई गाड़ी में हमें सहारे से लिटाता होगा .. अस्पताल कि घंटिया घनघनायेंगी मानों कि टाए टाए कर मंत्री की गाड़ी की लाल बत्ती झिलमिलाई .. डॉक्टर भी अदब से नब्ज देखते होंगे... और डर डर के प्रश्न करते होंगे बीमारी का इतिहास रिकॉर्ड करते होंगे और खून जांच के लिए सेम्पल निकालने वाले के होश फाकता हो रहे होंगे लगता होगा मानों वो सुई नहीं चुभा रहा वरन कोई नस्तर घोप रहा हो खून की  नदियाँ  बहा रहा हो २ मिली खून निकालाना ऐसा लग रहा हो जैसे २ लीटर खून ज़ाया कर दिया हो ..डर से उसका रंग पीला पड रहा हो मानो अभी अभी टेक्निसियन ही दो यूनिट रक्तदान कर खड़ा हो .. मै सर उठाऊ तो घर वाले कहेंगे लेटे रहो लेटे रहो... मेरी एक आह पर सारा हॉस्पिटल दौड़ता होगा ..... कई कहेंगे अरे हुवा .क्या......डॉक्टर के चेहरे पर घबराहट होगी कहने में भी असमर्थ कि इन्हें ऐसी कोई बीमारी नहीं जिसमे इन्हें अस्पताल भर्ती किया जाए .. मै हाथ उठाऊँ तो लोग कहे अरे अरे जरा धीमे से... कोई मेरे हाथ के नीचे तकिया लगाये ..कोई मेरी सिरहाने पे तकिया को सही लगाएगा.. कोई चम्मच से मुझे फलो का रस पिलाएगा कोई अंगूर लाये कोई जूस .. और बड़े प्रेम से सब मुझे खिलाने की कोशिश .. अरे वाह क्या ठाट होंगे लेटे लेटे ही चीलमची में दन्त मंजन होगा .. गुनगुने तोलिये से कोई मुह पौंछता होगा.. पाऊडर , सेंट, डी - ओडो छिडकता होगा , फिर आएगी बारी तेल की...मेरे सर पर तेल डाल कोई सर दबाता होगा.... कोई रिश्तेदार कहती होंगी कि क्या पैर दबा दूं .. दूर दूर से लोग मुझे मिलने आते होंगे ..मित्र और रिश्तेदार ग्रीटिंग कार्ड लाते होंगे ..झुक झुक कर कहते होंगे - गेट वेल सून .. किसी के हाथ में फूल तो कोई बुक्के लाते होंगे .. मेरे एक हाथ में फोन होगा और रिश्तेदारों और मित्रो के फोन आते होंगे कैसी हो ..जल्दी ठीक हो जाओ .. और लोग शुभकामनाये देते होंगे .. और दुसरी तरफ मेरे  मुंह  में अनार के दाने मेरी भाभी डाल रही हो .. मेरा तो मन बाग़ बाग़ हो जायेगा.. मन कि बगिया में फूल खिल जायेंगे.. और मै फूल लेने खड़ी हो जाऊंगी..ख़ुशी से नाच उठूँगी ...डॉक्टर देख लेगा खुशी से कहेगा मरीज चंगा हो गया है..अब इन्हें कर देते है हम डिस्चार्ज ( मानों उनका सर दर्द जल्दी चला जाए ) ...तब तक आएगी आवाज धढ़ाम और मै फिर गिर जाऊंगी....... चुपके से एक आँख से देखूँगी कि कोई मुझे उठाने आया... और नहीं तो लगूंगी करहाने जोर जोर से... अरे...अरे समझा करो बीमारी के भी होते है अपने लुत्फ़ ...आराम का आराम और वी-वी-आई-पी ट्रीटमेंट चाहे कोई बीमारी हो न हो ...... " डॉ साहब  ऑपरेशन   थीअटर में  तैयारी हो गयी  है और मरीज शिफ्ट कर दिया... ( स्टाफ नर्स सामने खड़ी थी )  .. ओह! इतना आनंददाई क्षण था ये - अफ़सोस ख्वाब भी नहीं देखने देते ये  सब मुझे ...अभी अब जाना  पड़ रहा है....ड्यूटी जो बजानी है कर्तव्य - परायणता भी कोई चीज होती है  ..ओपरेशन थीएटर के बाहर लोगो के हाथ में बुक्के -मरीज के लिए .....काश कि चक्कर आ जाते मुझे  कि बुक्के मिल जाते मुझे  .. पर जाना है काम पर  और जा रही हूँ... बाई बाई .. जरा मेरे लिए शुभकामनाये दे दीजिये ..मेरे बीमार होने के लिए नहीं ..मेरे मरीज की जल्दी खुशहाली के लिए .........

Created by ॥ Dr Nutan Gairola 04/ April /2010
....... ********..........*******.............

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails