जीती रही जन्म जन्म, पुनश्च- मरती रही, मर मर जीती रही पुनः, चलता रहा सृष्टिक्रम, अंतविहीन पुनरावृत्ति क्रमशः ~~~और यही मेरी कहानी Nutan
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Thursday, November 24, 2011
Wednesday, January 26, 2011
आओ जश्ने आजादी मनाएं- एक व्यंग बाण - डॉ नूतन गैरोला २६-जनवरी २०११
Thursday, December 30, 2010
क्यूंकि वह वहसी दरिंदा था - डॉ नूतन गैरोला
| एक निरीह बेजुबान को किस तरह एक चतुर दरिंदे के आगे उसके अभिमान के लिए अपने प्राणों को गंवाना पड़ा या बेघर होना पड़ा .. और यह कोई नहीं जानता की वह इस दुनिया में है भी की नहीं ? |
Sunday, November 14, 2010
हम भी कभी बच्चे थे | बाल दिवस के अवसर पर |
बचपन के संस्मरण आज बाल दिवस पर मैं अपने बचपन के एक दो किस्से आप सभी से शेयर कर रही हूँ | क्यूंकि हम भी कभी बच्चे थे | |
बालमन - कहीं देखा सर्कस में रस्सी पर झूलती लड़की- मैंने चाहा की मै भी उस लड़की के जैसा कारनामा करूँ| तब में LKG में पढ़ती थी | उम्र लगभग तीन साल से चार साल के बीच | माँ ने हम दोनों बहनों को तैयार किया स्कूल जाने के लिए | मेरी कंघी पहले की और छोटी बहन के वो बाल बना ही रही थी कि मै बाहर बरामदे में आ गयी | ८-१० सीढ़ी नीचे सड़क थी और बरामदे में एक गोल स्तंभ था | उस स्तंभ के पास खड़ी नीचे सीढियाँ को देख जाने क्यों वो सर्कस के करतब याद आये .. और अपने ऊँगली में मैंने बदरीनाथ भगवान की अंगूठी देखी सोचा क्यों ना इसे खम्बे में अटका कर झूला झूलूँ जोर जोर से जैसे सर्कस में हतप्रभ करने वाले करतब देखे, उनकी तरह | और मैंने अपनी ऊँगली सीधी की और अंगूठी को खम्बे में फ़साने का जत्न करते हुवे लटक गयी और झूलने लगी - अरे ये क्या ! मै तो धडाम से उंचाई से १० सीढ़ी नीचे गिर पड़ी | सीधे सीढ़ी के कोने से सर जा टकराया |जाने क्यों दर्द नहीं हुवा मुझे | सड़क पर आते जाते लोग ठिठक गए | और मैंने चाहा दिखाना कि मै कोई छोटी बच्ची नहीं हूँ | सीधे खड़ी हुवी और सीढ़ी की ओर मुडी |सीढ़ी चढ़ने लगी कि नजर गयी ऊपर वाली सीढ़ी पर जहाँ पर मेरे सर से खून का फव्वारा झड रहा था |माथे के बायीं ओर से तेज खून की धारा फव्वारे के रूप में निकल रही थी| तब तो चोट की डर नहीं माँ की डांट के डर से सिहरन उठने लगी | दरवाजे से अंदर पहुंचते ही माँ ने मेरे चेहरे की जगह बहती खून की धारा देखी तो घबरा गयीं | हाथ से उन्होंने मेरा माथा दबाया पूछा ये क्या हो गया , कैसे हो गया .. बड़े भाईसाहब को आवाज लगाने लगी | एक साफ़ साडी को चीर कर माथे पे पट्टी बाँधी भाईसाहब और माँ ने | छोटी बहन थी घर में और माँ ने किचन में खाना भी चढाया था अतः भैया को आवश्यक हिदायत दे कर खुद मुझे गोद में ले बहुत तेज क़दमों से पास के क्लिनिक, जो की शायद आधा किलोमीटर दूर था ले गयी| मैं माँ की गोद में थी और मेरा सर माँ के कंधे पर था, माँ के खुले बालो से टपकता खून मुझे आज भी दिखाई देता है| दौड़ती भागती माँ डॉक्टर के पास पहुची तो डॉक्टर किसी अन्य केस में व्यस्त था और मेरा इलाज शुरू होने में देर हो गयी | जब मेरा नंबर आया तो डॉक्टर को टांके मारने /सिलने के लिए सुई ही नहीं मिली | और कहा कि सुई लाने तक बच्ची के शरीर से काफी खून बह जायेगा| अतः उन्होंने मेरे घाव की पेकिंग कर दी और ऊपर से पट्टी कर दी | जिसकी वजह से उस समय मेरा खून तो रुक गया पर मेरे माथे पर एक गहरी चोट का निशान रह गया |अब आई पूछताछ की बारी, जब शाम को घर पे पूछा गया कि कैसे गिरी | मेरी गिग्घी बंध गयी| ऐसा लगा कि इस तरह से झूला झुलना और मूर्खता करना अपराध था |जाने कौन सा भय मुझे कचोटने लगा कि मार अब पड़ी तब पड़ी| और भय में मैंने अपने को बचाने की एक युक्ति निकली | कह दिया किसी ने मेरा हाथ खिंचा था | ये कहना क्या था कि माँ डर गयी | बोली किसने खिंचा था बता | याद कर | कहने लगे सूरत किस से मिलती जुलती थी | अब तो झूठ बोल चुकी थी अब बचने की और सूरतें भी खतम हो गई| कह दिया कोई देखा देखा सा है | पूछा किसके जैसा उस बच्ची ने कहा दूध वाले के बेटे जैसा | बोला कि झूट तो नहीं बोल रही है | वैसे झूठ बोलना आदतों में सुमार ना था| झूट बोला मैंने कांपते दिल से| कुछ कुछ उसके जैसा था | नहीं चाहती थी कि बात आगे बढे पर बात थी कि रुकी नहीं | और उस छोटी बच्ची को अगले दिन दूध वाले के घर ले जाया गया | धुंधली यादें है कि आँगन में उनके बच्चे खड़े थे और मैं माँ से चिपकी रो रही थी अब डर था कि उन बच्चो को मेरी वजह से मार न पड़े | जब जब वो पूछे की पहचानो मैं और डर कर जोर जोर से रोने लगती | आखिरी में दो तीन बच्चो के बीच मैंने कहा कि इनके जैसा था पर ये नहीं और उन बच्चो को भी राहत मिल गयी | उस दिन का वो झूठ जो अनायास बोला, मै जिंदगी भर झूठ बोलने से डर गयी | तीन साल की थी डर ऐसा व्याप्त था कि इसे कभी भुला नहीं सकी | मै खुद को उन बच्चो का गुनाहगार मानती रही और ये सर की चोट सदा याद दिलाती रही हादसे की और आज भी मुझे झूठ से सख्त नफरत है | |
बचपन कितना सरल और भोला होता है..झूठ सच नहीं जानता || जिसने जैसा बताया मानता है | विस्मित होता है किन्तु विश्वास करता है क्यूंकि उसके लिए दुनिया की हर चीज नयी और विस्मय से भरी होती है | एक रोज घर में, छुट्टी पर पिताजी और सभी थे | किन्तु दिन में ( र ) भाईसाहब जी, जो कि तब पांच साल के रहे होंगे बाहर खेलने गए |थोड़ी देर बाद किसी बच्चे कि हृदयविदारक चीख और रोने कि आवाज से सब चौंक गए | भाईसाहब (र) रोते हुवे घर आ रहे थे | उनका मुँह खुला का खुला था | पिता जी ने कहा, क्या हुवा ? क्यों रो रहे हो ? किन्तु भाईसाहब और जोर जोर से रोने लगे - बेहद भयभीत थे और उनका सारा शरीर अकडा हुवा था पिता जी ने जैसे ही (र) को छुवा वो पैर भी पटकने लगे | सब घबरा गए कि कही सांप ने तो नहीं काटा होगा ? क्या हुवा होगा ? पूछते रहे पर वो सुन भी नहीं रहे थे, अब तो मुँह भी खुला था और पैर भी पटक रहे थे और पूरा शरीर ऐंठा जा रहा था और डर से पसीने भी छूट रहे थे - पिताजी ने फिर गुस्से में कहा ताकि वो अपनी समस्या के बारे में बताएं बोल क्या हुवा | तो (र)भाईसाहब के मुंह से एक वाकया फूटा – “ मुर्दे की खीर “ |मुर्दे की खीर जैसे शब्द से सभी नावाकिफ थे, सब घबरा गए - भैया ने बाहर की तरफ इशारा कर के बताया मुर्दे की खीर | बहुतेरी कोशिश की गयी कि वो बताएं कि क्या हुवा उनके साथ ..लेकिन डर के मारे उनका शरीर अकडा हुवा था बस अब एक ही शब्द बोल कर चिल्ला रहे थे - मुर्दे की खीर - फिर एक जोर की थपकी पडी गाल पे | एक दम भाईसाहब को होश आया | माँ भी बोली कि बताओ क्या हुवा क्यों इतना रो रहा है | भाईसाहब ने बाहर इशारा किया मुर्दे की खीर और डर के मारे माँ की गोद में छुप गए जैसे अब मुर्दे की खीर से कोई अनर्थ होने वाला है और चिल्ला रहे थे मुझे बचाओ | पिता जी बाहर गए कुछ बच्चे वहाँ पर भयभीत थे | पिता जी ने उनसे पूछा क्या बात है बच्चो क्यों डर रहे हो | तब एक बच्चा फटी फटी आँखों से बोला अंकल जी, अभी यहाँ से लोग एक मुर्दे को उठा कर ले जा रहे थे और उस पर चावल डाल रहे थे | तब पिता जी ने सड़क पर देखा तो बहुत चावल के दाने फैले हुवे थे | चावलों को देख पिता जी ने कहा तो क्या हुवा चावल के दानो से ? बच्चो ने बताया की एक बहुत बड़े भाईसाहब यहाँ पर खड़े थे उन्होंने कहा की बच्चो ये चावल के दाने मुर्दे की खीर हैं | ये मुर्दे का खाना है | इस लिए इस बात का ख्याल रखना कि इस पर पैर न लगे नहीं तो मुर्दा उस बच्चे को खा जायेगा | ( किसी ने बच्चो के साथ मजाक की थी ) बच्चों ने बताया कि उस समय वो लोग सड़क के उस पार खड़े थे | सड़क को पार करने के लिए उन्हें बहुत मेहनत करनी पड़ी | एक एक कदम उन्होंने सड़क पर बैठ बैठ कर चावल के दानो को देख कर कर रखा जो कि बहुत कठिन था | किन्तु बेचारे ( र )का पैर एक चावल के दाने पर छू गया था ..उसके साथ रास्ता पार करते उसके दोस्त (म ) ने भी देखा | म चिल्लाया और र घबरा गया वह चीखता हुवा घर भागा |बच्चे बोले - अंकल हमने तो सड़क पार कर दी पर र का अब क्या होगा? पिता जी के हँसते हंसते बुरे हाल हो गये | किन्तु र भाईसाहब को मुर्दे की खीर के भय से आजाद करने में समय लगा | घटना के समय मैं बहुत छोटी थी | जो सुना वो बताया | |
अरे ! वो जलते दीये किसने बुझा दिये हैं ?.. वह वृद्धा उस झोपडी में उस घुप्प अन्धकार में ? जिसने कल्याण किये हैं ..|| वो अट्टालिका वो इमारते जगमगाती रोशनी है जिसमे, असंख्य विद्युत बल्ब हैं , पराया रक्त चूस कर जिसमें || वह वृद्धा उस अन्धकार में उठती कुछ टटोलती | गोद में ले एक रोग पीड़ित परोपकार का बच्चा || उठती वह खांस कर, कुछ कदम लड़खड़ा कर | वापस लौट आती है वो इमारत में झाँक कर || आज अब वो झोपड़ी निरंग और सुनसान है | बुढ़िया का न बच्चे का उस झोपड़ी में कहीं नाम और निशान है || काश !ऐ इमारत वालो तुम में कुछ दया भाव होता | तुमने बंद खिड़की को खोल कुछ प्रकाश पुंज बिखेरा होता | तो आज इस धरती पर एक पवित्र आत्मा का तो निवास होता || द्वारा .. Miss Nutan Dimri / डॉ नूतन गैरोला यह कविता मै, जब १५ साल की थी, तब लिखी थी पुरानी डायरी के पन्नो से उतारी है | और डायरी के वो पेज भी मैंने फोटो में डाले हैं पुराने यादे - कविता बचपन की बाल दिवस पर हार्दिक शुभकामनायें और बधाइयाँ |
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Sunday, October 31, 2010
पहाड़ / उत्तराखंड/ गढ़वाल ( गाँव ) की एक दीपावली - २००९ Dr Nutan Gairola
पहाड़ / उत्तराखंड/ गढ़वाल ( गाँव ) की एक दीपावली - २००९
घर की सफाई, रंग-रोगन कुछ दिन पहले से शरू हो जाता है | फिर दीपावली के दिन सुबह सवेरे स्नान ध्यान के बाद बनती हैं फूल मालाएं | बच्चे लोग फूलों की मालाएं बनाते है और दीये के लिए बाती | माँ पिता घर की सफाई करते है और रसोई में बनती है -पूड़ी पकौड़ी .. इसके साथ ख़ास बनता है " पिण्डा " - पिण्डा गाये, बैल, बछिया को खिलाने के लिए पके हुए चावल / भात , झंगोरा / ज्वार और आटे का हाथ से बनाया हुआ बड़ा बड़ा लड्डू होता हैं | पिंडों की थाली भी विशेष रूप से सजाई जाती है| हर पिण्डे पर एक फूल ( अक्सर गेन्दा ) रोपा हुआ होता है |गाय की पूजा की जाती है| फूल मालाएं पहनाई जाती हैं | तिलक लगा के उनके सींगों पर तेल या घी की मालिश करते हैं .. और फिर उन्हें " पिण्डा" खिलाया जाता है |
दरवाजों/ देल्ली के चौखटों को और लकड़ी के खम्बों को सुन्दर पीले, लाल और सफ़ेद रंगों से क्रमशः हल्दी, रोली और आटे के बिंदियो से सजाते ( बिर्याते ) हैं | दरवाजे के दोनों कोनों पर थोडा सा गोबर लगा कर उसे रंगों से बिर्याते है और जौ से सजाते है व दरवाजे और पूजा घर को फूल मालाओं से सजाते है |
दिन में लडकियां और महिलाएं घर की सजावट में गेरू से रंग कर, पिसे चावल से रंगोली सजाते है | रंगीन मिट्टी भी कहीं कहीं पर इस्तेमाल करते है | या फूलों की रंगोली भी और लक्ष्मी के पैरों के निशान घर के बाहर से भीतर जाते पूजाघर या अनाजघर तक जाते हुवे अंकित करते हैं |
शाम को पूड़ी ( स्वाल ), पकौड़ी, हलवा बनता है| लजीज व्यंजन बनाये जाते है | पानी की धारा ( मंगरा ), हल के फल और जोल की व ओखली और मुसल ( गंज्याला ) को भी सजाया/ बिर्याया जाता है | इनकी पूजा की जाती है क्यूंकि किसानों के लिए गाय बैल हल, पानी और अनाज को कूटने वाला ओखल बहुत महत्वपूर्ण हैं |
पूड़ी, पकौड़ी, खील, बताशे, मिठाइयाँ और दीयों के थाल सज जाते है| पूजा की सामग्री के साथ पैसा या जेवर, सोना आदि भी रखा जाता है | गणेश जी और लक्ष्मी जी की पूजा होती है |
जगमग दीये और गणेश लक्ष्मी की पूजा
फिर दीप मालाएं सजाई जाती हैं | घर का कोना कोना दीपज्योति से जगमगाने लगता है| आज कल फुलझड़िया, अनार, बम-पटाखे भी फोडे जाते है |
किन्तु गाँवो में भेल्लो / भेलो खेलते है | जिसमें लकड़ियों का एक छोटा गट्ठा बाँध कर घुमातें हैं | गाँववासी इसका बहुत आनंद लेते है | दुसरे गाँव वाले भी, और सभी गाँव से बाहर इकठ्ठा हो कर नाचते हैं और रोशनी का त्यौहार भेल्लो के साथ मानते है और " भेल्लो रे भेल्लो " गीत भी गातें हैं |
घर में बनी पूड़ी, पकौड़ी , खील- बतासे, मिष्ठान आदि का आदान प्रदान करतें हैं और दिवाली मिलन करते है | बच्चो को ये त्यौहार खासा पसंद आता है |
आप सभी का त्यौहार मंगलमय हो | खुशियों को लाने वाला, मन के अंधेरो, राग द्वेश को मिटाने वाला और आपसी प्रेम को बढाने वाला हो | दीपमालाएं प्रज्वलित कीजियेगा किन्तु नाहक बारूद को जला जला कर वातावरण प्रदूषित न किया जाये तो हम सबके लिए और हमारी पृथ्वी के लिए बेहतर होगा | आग से, बारूद से बचें और एक सुरक्षित, पर्यावरण संरक्षित और सौहार्दपूर्ण दीपावली मनाएं -
शुभकामनाएं सहित - डॉ नूतन गैरोला
सभी फोटो मेरी निजी एल्बम से सिर्फ आखिरी फोटो को छोड़ कर - डॉ नूतन गैरोला
घर की सफाई, रंग-रोगन कुछ दिन पहले से शरू हो जाता है | फिर दीपावली के दिन सुबह सवेरे स्नान ध्यान के बाद बनती हैं फूल मालाएं | बच्चे लोग फूलों की मालाएं बनाते है और दीये के लिए बाती | माँ पिता घर की सफाई करते है और रसोई में बनती है -पूड़ी पकौड़ी .. इसके साथ ख़ास बनता है " पिण्डा " - पिण्डा गाये, बैल, बछिया को खिलाने के लिए पके हुए चावल / भात , झंगोरा / ज्वार और आटे का हाथ से बनाया हुआ बड़ा बड़ा लड्डू होता हैं | पिंडों की थाली भी विशेष रूप से सजाई जाती है| हर पिण्डे पर एक फूल ( अक्सर गेन्दा ) रोपा हुआ होता है |गाय की पूजा की जाती है| फूल मालाएं पहनाई जाती हैं | तिलक लगा के उनके सींगों पर तेल या घी की मालिश करते हैं .. और फिर उन्हें " पिण्डा" खिलाया जाता है |
गौ पूजन और पिण्डा खिलाते हुए
दिन में लडकियां और महिलाएं घर की सजावट में गेरू से रंग कर, पिसे चावल से रंगोली सजाते है | रंगीन मिट्टी भी कहीं कहीं पर इस्तेमाल करते है | या फूलों की रंगोली भी और लक्ष्मी के पैरों के निशान घर के बाहर से भीतर जाते पूजाघर या अनाजघर तक जाते हुवे अंकित करते हैं |
दीये से सुसज्जित रंगोली, पूजा और घर
शाम को पूड़ी ( स्वाल ), पकौड़ी, हलवा बनता है| लजीज व्यंजन बनाये जाते है | पानी की धारा ( मंगरा ), हल के फल और जोल की व ओखली और मुसल ( गंज्याला ) को भी सजाया/ बिर्याया जाता है | इनकी पूजा की जाती है क्यूंकि किसानों के लिए गाय बैल हल, पानी और अनाज को कूटने वाला ओखल बहुत महत्वपूर्ण हैं |
पूड़ी, पकौड़ी, खील, बताशे, मिठाइयाँ और दीयों के थाल सज जाते है| पूजा की सामग्री के साथ पैसा या जेवर, सोना आदि भी रखा जाता है | गणेश जी और लक्ष्मी जी की पूजा होती है |
जगमग दीये और गणेश लक्ष्मी की पूजा
फिर दीप मालाएं सजाई जाती हैं | घर का कोना कोना दीपज्योति से जगमगाने लगता है| आज कल फुलझड़िया, अनार, बम-पटाखे भी फोडे जाते है |
फूलझड़ी, अनार जलाते हुवे बच्चे
किन्तु गाँवो में भेल्लो / भेलो खेलते है | जिसमें लकड़ियों का एक छोटा गट्ठा बाँध कर घुमातें हैं | गाँववासी इसका बहुत आनंद लेते है | दुसरे गाँव वाले भी, और सभी गाँव से बाहर इकठ्ठा हो कर नाचते हैं और रोशनी का त्यौहार भेल्लो के साथ मानते है और " भेल्लो रे भेल्लो " गीत भी गातें हैं |
पारंपरिक भेल्लो खेलते हुए
घर में बनी पूड़ी, पकौड़ी , खील- बतासे, मिष्ठान आदि का आदान प्रदान करतें हैं और दिवाली मिलन करते है | बच्चो को ये त्यौहार खासा पसंद आता है |
दीपावली पर हार्दिक शुभकामनाएं
आप सभी का त्यौहार मंगलमय हो | खुशियों को लाने वाला, मन के अंधेरो, राग द्वेश को मिटाने वाला और आपसी प्रेम को बढाने वाला हो | दीपमालाएं प्रज्वलित कीजियेगा किन्तु नाहक बारूद को जला जला कर वातावरण प्रदूषित न किया जाये तो हम सबके लिए और हमारी पृथ्वी के लिए बेहतर होगा | आग से, बारूद से बचें और एक सुरक्षित, पर्यावरण संरक्षित और सौहार्दपूर्ण दीपावली मनाएं -
शुभकामनाएं सहित - डॉ नूतन गैरोला
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Wednesday, October 20, 2010
मेला कर्फ्यू का --एक पहाड़ी लघुकथा - Dr Nutan Gairola
यह कहानी सत्य घटना पर आधारित है | ये घटना तब की है जब उत्तराखंड आन्दोलन होने पर कर्फ्यू लगा दिया गया था | मैंने उसका विस्तार अपनी सोच से किया है पर मूल में सच्चाई है..पहाड़ की एक सीधी साधी वृद्ध महिला कर्फ्यू लगा है, कर्फ्यू एक मेला होता है ऐसा समझ -----
लेखक - डॉ नूतन गैरोला - २०/१०/२०१० १८ : ४५
पहाड़ के लोग सीधे साधे .. और तब और ज्यादा जब कि वो दूर-दराज के रहने वाले हो -- ऊपर से जब कोई वृद्धा की बात हो | ऐसी ही एक सीधे साधे पहाड़ी वृद्ध माता ( रुक्मा - काल्पनिक नाम ) की बात लिख रही हूँ .. ,, बात तब की है जब उत्तराखंड आन्दोलन जोर पे था | पहाड़ में माहोल बहुत शांतिमय रहा करता था .. लोगो ने दंगा फसाद नहीं जाना ना देखा था ... और फिर कर्फ्यू का क्या मतलब ? लोग गाँव के खेती किसानी में व्यस्त और कभी मेला ठेला होता तो वहां चरखी में घूमना .. सर्कस देखना .. तब चाट गोलगप्पे खाना .. रंगबिरंगी चूड़िया पहनती महिलाये, बालों के लिए चुटिया खरीदती .मेले में बिकते बुडिया के बाल खाती ...यही मौका होता जब काम से दूर सहेलियों के साथ हंसी ख़ुशी मनाते.. या फिर कही देवी भाग्वत होता, कथा प्रवचन होता तो खेत से आने के बाद नहा धो कर कथा सुनने जाते और प्रसाद पा कर धन्य हो जाते ...
ऐसे भोले भाले लोग जिन्होंने टेढ़ी बात देखी ना सोची, ... एक दिन वहां के छोटे छोटे शहरों में कर्फ्यू का ऐलान हो गया | लोग घरों में बंद .. रुक्मा विधवा वृद्धा .. खेतों में काम करते समय बातो बातों में सुना कि आज शहर में कर्फ्यू लगा है |जैसे कोई मेला लगा हो | रुक्मा ने पूछा अन्य महिलाओ से कि ये कर्फ्यू क्या होता है... महिलाओं ने बताया कि हमने सुना है पर देखा नहीं... सुना है उधर शहर में जाने नहीं दे रहे है... रुक्मा के मन में भाँती भाँती की मिठाइयों की दुकाने, झूले , प्रदर्शनी, मेला ,सर्कस, कथा प्रवचन घुमने लगे .. शायद कर्फ्यू ऐसा ही कुछ होता होगा .. फिर उसने पूछा कि कोई मेरे साथ कोई चलेगा देखने .. वहां पर काम करती महिलाओं ने कहा बच्चे अभी घर पर रो रहे होंगे हमें तो घर जाना जरूरी है .. घर गए तो फिर बाजार नहीं जा सकेंगे .. देर हो जाएगी .. गाँव खेत से दुसरी तरफ है शहर बाजार दुसरी तरफ .. फिर उन महिलाओं ने मिल कर वृद्धा को कहा -बोडी ( ताई ) तू चली जा ना - घर में कौनसे कोई तेरा इन्तजार कर रहा है.. और बताना कैसा था कर्फ्यू .. कल हम भी साथ चलेंगे .. आज कपडे भी अच्छे नहीं पहने हैं .. . रुक्मा जो गाँव के सहयोग में आगे रहती थी सोचा कि चलो आज मैं चली जाउंगी ..कल इन लोगो के साथ मैं फिर चली जाउंगी... और फिर रुक्मा ठहरी अकेली घर में, बच्चे भी बहुत दूर कहीं देश ( पहाड़ से दूर ) में .. कोई पूछने वाला भी नहीं.. सो वह कथा प्रवचन , रामलीला , मेले में जाना पसंद करती .. इस तरह से वो अपना बुडापा काट रही थी |
रुक्मा शहर की ओर चली | खेतों को पार करके जंगल और फिर शहर की ओर जाता तीखा ढलान | ढलान को पार कर के वो जंगल के दुसरे छोर जा निकली ... वहां स्कूल को पार किया तो किसी ने पूछा माता जी कहाँ जा रही हो ? वह बोली बेटा कर्फ्यू देखने जा रही हूँ | व्यक्ति बोला वहां मत जाना ..मनाही है पुलिस भी लगी है | ठीक है बेटा .. मैंने तो कोई अपराध नहीं किया मुझे क्यों पुलिस पकड़ेगी ..पुलिस का कुछ नहीं बिगाड़उंगी | किसी का बुरा नहीं करुँगी .. चुपके से कर्फ्यू देख कर लौट आउंगी ..
बुडी रुक्मा पुलिस और कर्फ्यू का आपसी सम्बन्ध न समझ पाई | ये आखिरी ढलान थी जहाँ दोनों ओर बेतरतीबी से बिखरे पहाड़ी शहर के मकान थे | खिड़की से एक औरत ने आवाज लगायी - ए बड़ी जी ( ए ताई जी ) कहाँ जा रही हो ? वहां मत जा बडी- पुलिस लगी है | बड़ी( रुक्मा ) ने कहा सिर्फ कर्फ्यू देखने जा रही हूँ | महिला बोली बड़ी हिम्मत है - लोग तो नहीं जा रहे |
रुक्मा ने सोचा एक तो आज तक कभी कर्फ्यू नहीं लगा यहाँ " पहली बार लगा है .. कैसे सोये लोग हैं ये जो मेला तो देख लेते है जो साल में दो बार लगता है...और कर्फ्यू पुलिस की डर से नहीं देख रहे है ...पुलिस वाले भी तो हमारे बेटे ही है... गाँव का रग्घू भी तो पुलिस वाला है ... कितना अच्छा बच्चा है ... और फिर मैंने तो पूरी उम्र ही बिता दी पर कभी कर्फ्यू नहीं लगा .... इतना ख़ास है ये कर्फ्यू - सुना है कि बाहर से पुलिस भी आई है... फिर क्यों ना देखें - कल तो मेरे गाँव की महिलायें भी आएँगी -
रुक्मा बाजार पहुँच गयी - अरे ये क्या ? बाजार बंद है लोग भी नहीं दिख रहे है... रुक्मा सोचने लगी -- हाँ~~~~ ये कर्फ्यू का कमाल है | इतना सुन्दर प्रोग्राम होगा तो सभी दुकाने बंद कर कर्फ्यू देखने गए है.. रुक्मा तेज़ी से कदम बड़ा कर कर्फ्यू वाली जगह ढूंढने लगी | तभी एक पुलिस वाले की कर्कश आवाज कान में गूंजी - ऐ बुडी कहाँ जा रही है - रुक्मा बोली - बेटे ! कर्फ्यू देखने - कहाँ है वो ? पुलिस वाले ने और सख्त और कर्कस आवाज में कहा - चुपचाप घर फौरन चली जा | जाउंगी जाउंगी .. पुलिस वाला बोला ठीक है | रुक्मा तेज कदम से आगे बढने लगी पुलिस वाला भी दुसरी राह हो लिया... रुक्मा सोच रही थी इतनी दूर से थक हार के यहाँ आई हूँ अब ऐसा कैसे हो कि कर्फ्यू ना देखूं | फिर कोई बताने वाला भी नहीं कि कहाँ पर कर्फ्यू का पंडाल सजा है | .. थोड़ी दूर पर एक पुलिस वाला दिखाई दिया रुक्मा सड़क की दुसरी तरफ जाने लगी तो पुलिस वाला बोला - माता जी कहाँ जा रही हो - वापस घर जाओ - रुक्मा बोली कर्फ्यू देखने - पुलिस वाला बोला क्या मजाक है - सीधे सीधे वापस जा - रुक्मा बोली नहीं जाउंगी - कर्फ्यू कहाँ है ? कैसा होता है ? सब लोग कर्फ्यू देख रहे है यहाँ ..आज तो मैं कर्फ्यू देखे बगैर नहीं जाउंगी| पुलिस वाले ने कहा कहना नहीं मानेगी तू ... और यह कह कर एक बहुत तेज़ डंडे का वार रुक्मा की पीठ पर कर दिया | रुक्मा पीड़ा से चिल्लाई .. दर्द से करहाते हुवे बोली यह क्या है क्यों मारा तुने ? पुलिस वाला बोला यही कर्फ्यू है अब ले कर्फ्यू का मजा यह कह कर उसने रुक्मा के पैरों पर तेजी से डंडे के प्रहार किये ... रुक्मा का बुड्ढा शरीर इन अप्रत्याशित वारों को झेल ना पाया -एक तीखी चीख के साथ उसकी उसकी आवाज गले में फंस गयी ... उसकी आँखों के आगे अन्धेरा छाने लगा ........................................
लेखक - डॉ नूतन गैरोला - २०/१०/२०१० १८ : ४५
Thursday, September 9, 2010
" खतरा है - होशियार ! खबरदार " ...एक लेख ..डॉ नूतन
" खतरा है - होशियार ! खबरदार "

नेट -
जी हां - जिसका नाम ही नेट है मतलब कि जाला - जो इस नेट / जाले में गिरा वो फंसा |
चाहे जाल पक्षी को पकड़ने के लिए फैंका गया हो, या फिर जानवर या कीट पतंगों के लिए - जाल पड़ा नहीं कि फंसा |
मैंने मकड़ियो के जालो में फंसे कीड़ो को तडपते देखा है - फंसते चले जाते है जालों के तानो बानो में और मकड़ी के हाथ काल के ग्रास बन जाते है |
पर इन्टरनेट का जाला इन जालो से भी खतरनाक - स्वयं आदमी द्वारा निर्मित - जहाँ आदमी स्वेच्छा से आता है पर हर एक सरल क्लिक के साथ अलग अलग किस्म के जालो में धंसता चला जाता है |
गनीमत है कि वो वहां अटका ही रहे - बड़ी बात कि वो बाहर निकल जाये - लेकिन वो फंसता ही चला जाता है |
ये जाले एक से एक रंगीन तानो बानो का बुना होता है - बड़ा आकृष्ट करने वाला लुभावना होता है
और सजे रहते है विभिन्न सजावटी सामानों से मसलन कि कहीं जानकारियों का अड्डा, कहीं लेख, कही गाने, कहीं चित्र, कहीं मित्र आदि - लेकिन सभी काल्पनिक , जब तक कि हकीक़त में न हो अपने पास - जैसे कि काल्पनिक गाजर का हलुवा का एक चित्र, लीजिये उड़ा लीजिये मजा नेट के मित्रो के साथ लेकिन काल्पनिक
और अगर मानवीय भावनाओं का रंग चढ़ा कर पेश किया जाए तो ? आदमी इस भूल भुलैया में फंसता चला जाता है और हकीक़त से दूर दूर होता चला जाता है |
काल्पनिक संसार की हकीक़त ही में जीने लगता है |
तब सुख दुःख भी वहाँ सुख दुःख के साथी भी वहाँ |
अच्छे साथी मिले तो काल्पनिक संसार कि वास्तविकता में ख़ुशी आ जाती है और वास्तविक मित्रता भी हो जाती है ,
पर ज्यादातर गाजर के हलुवे के चित्र की हकीक़त जैसे - मुखौटो के संग |
ऐसे में मानवीय भावनाओं का शोषण होने का पूर्ण खतरा , मानसिक उत्पीड़न का भय और दिल टूटने की पीड़ा |
इंसान मुक्ति के लिए हाथ पैर पटकता है पर मोह जाल जैसा ये जाला - जाला भी क्या करे उसने तो नहीं कहा था कि तुम आओ, जो अब कह दे कि अब चले जाओ
और कुछ अदद मकड़े आदमी का मुखौटा लगाये तैयार खड़े इस भोले आदमी का निवाला बनाने l बेचारा आदमी, जालों के चक्रव्यूह को तोड़ कर वापस नहीं लौट पाता - ऐसे में मनोचिकित्सक भी क्या ख़ाक करेंगे इस दर्द का इलाज
दवाइयों का सहारा
कांच फर्श पर गिर जाये तो आवाज होती है पर यहाँ तो बिना आवाज के सब कुछ टूट जाता है - लो बैठे बिठाये घर के कमरे में ही मुसीबत |टूट जाती है इंसानी फितरत ,यकीन , रिश्ते - पर नहीं टूटता है तो ये जाला |
जाल और दमकता जाता है नित नए नए रंगों के साथ और हर रोज हजारो नए इंसानी कीड़े इस जाले के अन्दर घुसते है और ये सिलसिला बदस्तूर यूं ही चलता रहता है हर क्लिक के साथ
कुटिल समझदार लोगो के लिए है ये दरवाजा - जो दिमाग से बोलते हैं |
जो दिल से बोलते हैं और दुसरे पर भी ऐसा ही यकीन करते हैं, ऐसे सीधे सच्चे इंसान नेट / जाल में बैठे मकड़ों का शिकार हो जाते हैं |
" खतरा है - होशियार ! खबरदार "
.....Dr Nutan .. 09/092010 .. 6:30 A:M

नेट -
जी हां - जिसका नाम ही नेट है मतलब कि जाला - जो इस नेट / जाले में गिरा वो फंसा |
चाहे जाल पक्षी को पकड़ने के लिए फैंका गया हो, या फिर जानवर या कीट पतंगों के लिए - जाल पड़ा नहीं कि फंसा |
मैंने मकड़ियो के जालो में फंसे कीड़ो को तडपते देखा है - फंसते चले जाते है जालों के तानो बानो में और मकड़ी के हाथ काल के ग्रास बन जाते है |
पर इन्टरनेट का जाला इन जालो से भी खतरनाक - स्वयं आदमी द्वारा निर्मित - जहाँ आदमी स्वेच्छा से आता है पर हर एक सरल क्लिक के साथ अलग अलग किस्म के जालो में धंसता चला जाता है |
गनीमत है कि वो वहां अटका ही रहे - बड़ी बात कि वो बाहर निकल जाये - लेकिन वो फंसता ही चला जाता है |
ये जाले एक से एक रंगीन तानो बानो का बुना होता है - बड़ा आकृष्ट करने वाला लुभावना होता है
और सजे रहते है विभिन्न सजावटी सामानों से मसलन कि कहीं जानकारियों का अड्डा, कहीं लेख, कही गाने, कहीं चित्र, कहीं मित्र आदि - लेकिन सभी काल्पनिक , जब तक कि हकीक़त में न हो अपने पास - जैसे कि काल्पनिक गाजर का हलुवा का एक चित्र, लीजिये उड़ा लीजिये मजा नेट के मित्रो के साथ लेकिन काल्पनिक
और अगर मानवीय भावनाओं का रंग चढ़ा कर पेश किया जाए तो ? आदमी इस भूल भुलैया में फंसता चला जाता है और हकीक़त से दूर दूर होता चला जाता है |
काल्पनिक संसार की हकीक़त ही में जीने लगता है |
तब सुख दुःख भी वहाँ सुख दुःख के साथी भी वहाँ |
अच्छे साथी मिले तो काल्पनिक संसार कि वास्तविकता में ख़ुशी आ जाती है और वास्तविक मित्रता भी हो जाती है ,
पर ज्यादातर गाजर के हलुवे के चित्र की हकीक़त जैसे - मुखौटो के संग |
ऐसे में मानवीय भावनाओं का शोषण होने का पूर्ण खतरा , मानसिक उत्पीड़न का भय और दिल टूटने की पीड़ा |
इंसान मुक्ति के लिए हाथ पैर पटकता है पर मोह जाल जैसा ये जाला - जाला भी क्या करे उसने तो नहीं कहा था कि तुम आओ, जो अब कह दे कि अब चले जाओ
और कुछ अदद मकड़े आदमी का मुखौटा लगाये तैयार खड़े इस भोले आदमी का निवाला बनाने l बेचारा आदमी, जालों के चक्रव्यूह को तोड़ कर वापस नहीं लौट पाता - ऐसे में मनोचिकित्सक भी क्या ख़ाक करेंगे इस दर्द का इलाज
दवाइयों का सहारा
कांच फर्श पर गिर जाये तो आवाज होती है पर यहाँ तो बिना आवाज के सब कुछ टूट जाता है - लो बैठे बिठाये घर के कमरे में ही मुसीबत |टूट जाती है इंसानी फितरत ,यकीन , रिश्ते - पर नहीं टूटता है तो ये जाला |
जाल और दमकता जाता है नित नए नए रंगों के साथ और हर रोज हजारो नए इंसानी कीड़े इस जाले के अन्दर घुसते है और ये सिलसिला बदस्तूर यूं ही चलता रहता है हर क्लिक के साथ
कुटिल समझदार लोगो के लिए है ये दरवाजा - जो दिमाग से बोलते हैं |
जो दिल से बोलते हैं और दुसरे पर भी ऐसा ही यकीन करते हैं, ऐसे सीधे सच्चे इंसान नेट / जाल में बैठे मकड़ों का शिकार हो जाते हैं |
" खतरा है - होशियार ! खबरदार "
.....Dr Nutan .. 09/092010 .. 6:30 A:M
Monday, April 5, 2010
लुत्फ़ बीमारी के..DR Nutan NiTi
हाय रे- जब भी मै रात्री इमरजेंसी करती हूँ .. घर जाती हूँ सुबह का उजाला दिल जला रहा होता है और में गृह कार्यो में अपना हाथ बंटाने लगती हूँ फिर दिन की OPD करती हूँ और आते जाते कोरिडोर से वार्ड पर निगाहें जाती है तो मेरा दिल बैठने लगता है ..अभी परसों की ही तो बात है एक नेता जी की बीबी को थोडा सा हल्का बुखार था और सारा हॉस्पिटल दौड़ाया हुवा था ..बाकी के मरीज भी नेता जी के हल्ले के आगे अपनी तकलीफ को हल्का पा रहे थे ... और मै तो उस लुत्फ़ का अंदाजा ले रही थी जो महोतर्मा साहिबा को मिल रहा था .. हम एक पैर पर उनके सिरहाने पर थे खड़े सर झुकाए ..जैसे कोई गुनाह हमने ही किया हो .. ये बुखार उनको हुवा नहीं मानों हमने दिया हो और अब हम को ही सजा भुगतनी है... हाय रे विधाता ! क्या यही विधान है ..मै इतनी स्वस्थ क्यों ..कब मेरा नंबर आये और हो जाऊं मैं बीमार .. भगवान् को लड्डू चढ़ाउंगी .. हे प्रभू ! हे दीनो के नाथ !! कुछ तो रहम कर और कर दो हमें भी बीमार .. हो जाये हल्का सा बुखार .. आये एक दो उलटिया .. और हो जाये लाल आँख .. यूं तो हम ज्यादा न हो बीमार पर दिखे जैसे हो हम अत्यंत बीमार .. कुछ साहस हमें भी देना प्रभो कि आये न हमें पर हम चक्करघिन्नी खाए और जहाँ बहुत भीड़ हो वहीँ पर गिर जाये और जमीन पर लोटपोट जाये.. तब क्या आनंद होगा .. हम को भी इधर उधर से लोगो ने पकड़ा होगा.. कोई पंखा झलता होगा .. कोई चिल्लाता होगा हटो हटो ..रास्ता छोड़ो ..लगता होगा कि आये है किसी प्रदेश के मुख्यमंत्री .. और होगा मेरा भी वैसा ही राजसी आव -भगत, सेवा - सुश्रुषा .. कोई निम्बू पानी लाता होगा .. कोई गाड़ी में हमें सहारे से लिटाता होगा .. अस्पताल कि घंटिया घनघनायेंगी मानों कि टाए टाए कर मंत्री की गाड़ी की लाल बत्ती झिलमिलाई .. डॉक्टर भी अदब से नब्ज देखते होंगे... और डर डर के प्रश्न करते होंगे बीमारी का इतिहास रिकॉर्ड करते होंगे और खून जांच के लिए सेम्पल निकालने वाले के होश फाकता हो रहे होंगे लगता होगा मानों वो सुई नहीं चुभा रहा वरन कोई नस्तर घोप रहा हो खून की नदियाँ बहा रहा हो २ मिली खून निकालाना ऐसा लग रहा हो जैसे २ लीटर खून ज़ाया कर दिया हो ..डर से उसका रंग पीला पड रहा हो मानो अभी अभी टेक्निसियन ही दो यूनिट रक्तदान कर खड़ा हो .. मै सर उठाऊ तो घर वाले कहेंगे लेटे रहो लेटे रहो... मेरी एक आह पर सारा हॉस्पिटल दौड़ता होगा ..... कई कहेंगे अरे हुवा .क्या......डॉक्टर के चेहरे पर घबराहट होगी कहने में भी असमर्थ कि इन्हें ऐसी कोई बीमारी नहीं जिसमे इन्हें अस्पताल भर्ती किया जाए .. मै हाथ उठाऊँ तो लोग कहे अरे अरे जरा धीमे से... कोई मेरे हाथ के नीचे तकिया लगाये ..कोई मेरी सिरहाने पे तकिया को सही लगाएगा.. कोई चम्मच से मुझे फलो का रस पिलाएगा कोई अंगूर लाये कोई जूस .. और बड़े प्रेम से सब मुझे खिलाने की कोशिश .. अरे वाह क्या ठाट होंगे लेटे लेटे ही चीलमची में दन्त मंजन होगा .. गुनगुने तोलिये से कोई मुह पौंछता होगा.. पाऊडर , सेंट, डी - ओडो छिडकता होगा , फिर आएगी बारी तेल की...मेरे सर पर तेल डाल कोई सर दबाता होगा.... कोई रिश्तेदार कहती होंगी कि क्या पैर दबा दूं .. दूर दूर से लोग मुझे मिलने आते होंगे ..मित्र और रिश्तेदार ग्रीटिंग कार्ड लाते होंगे ..झुक झुक कर कहते होंगे - गेट वेल सून .. किसी के हाथ में फूल तो कोई बुक्के लाते होंगे .. मेरे एक हाथ में फोन होगा और रिश्तेदारों और मित्रो के फोन आते होंगे कैसी हो ..जल्दी ठीक हो जाओ .. और लोग शुभकामनाये देते होंगे .. और दुसरी तरफ मेरे मुंह में अनार के दाने मेरी भाभी डाल रही हो .. मेरा तो मन बाग़ बाग़ हो जायेगा.. मन कि बगिया में फूल खिल जायेंगे.. और मै फूल लेने खड़ी हो जाऊंगी..ख़ुशी से नाच उठूँगी ...डॉक्टर देख लेगा खुशी से कहेगा मरीज चंगा हो गया है..अब इन्हें कर देते है हम डिस्चार्ज ( मानों उनका सर दर्द जल्दी चला जाए ) ...तब तक आएगी आवाज धढ़ाम और मै फिर गिर जाऊंगी....... चुपके से एक आँख से देखूँगी कि कोई मुझे उठाने आया... और नहीं तो लगूंगी करहाने जोर जोर से... अरे...अरे समझा करो बीमारी के भी होते है अपने लुत्फ़ ...आराम का आराम और वी-वी-आई-पी ट्रीटमेंट चाहे कोई बीमारी हो न हो ...... " डॉ साहब ऑपरेशन थीअटर में तैयारी हो गयी है और मरीज शिफ्ट कर दिया... ( स्टाफ नर्स सामने खड़ी थी ) .. ओह! इतना आनंददाई क्षण था ये - अफ़सोस ख्वाब भी नहीं देखने देते ये सब मुझे ...अभी अब जाना पड़ रहा है....ड्यूटी जो बजानी है कर्तव्य - परायणता भी कोई चीज होती है ..ओपरेशन थीएटर के बाहर लोगो के हाथ में बुक्के -मरीज के लिए .....काश कि चक्कर आ जाते मुझे कि बुक्के मिल जाते मुझे .. पर जाना है काम पर और जा रही हूँ... बाई बाई .. जरा मेरे लिए शुभकामनाये दे दीजिये ..मेरे बीमार होने के लिए नहीं ..मेरे मरीज की जल्दी खुशहाली के लिए .........
Created by ॥ Dr Nutan Gairola 04/ April /2010
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Created by ॥ Dr Nutan Gairola 04/ April /2010
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