जीती रही जन्म जन्म, पुनश्च- मरती रही, मर मर जीती रही पुनः, चलता रहा सृष्टिक्रम, अंतविहीन पुनरावृत्ति क्रमशः ~~~और यही मेरी कहानी Nutan
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Wednesday, August 1, 2012
Wednesday, July 18, 2012
My clicks My Photos - सुबह बगिया के सैर
| आज सुबह ७:१५ से ७:४५ (17/8/2012 )तक मैंने सैर की -- और अपने साथियों की तस्वीर खींच ली | आज चंद लम्हों में समेटा दुनियाँ जहां का प्यार मेरी बगिया की गिलहरी चिड़िया चीं चीं चहकती मुझसे बेपरवाह रहती मेरे इर्दगिर्द टहलती | और दीवार पर मेरे समान्तर घूमते रहते एक परिवार के नेवले आवाज लगाते और कहते हम है साथी सैर के ज़रा इधर भी देख ले | मैंने आव देखा न ताव ..तुरंत उन्हें अपने कैमरे से पकड़ लिया … |
सभी फोटो मेरी खींची, मेरी पर्सनल फोटो हैं…
Saturday, March 17, 2012
My Clicks (1) कुछ रंग दुनियां के - डॉ नूतन गैरोला
कल का मेरा दिन नाजुक फूलों के साथ गुजरा ..
महका महका हरा भरा ,,
कहीं खिलती थी चटख चांदनी ...
कहीं भवरों का पहरा था …
और उस सुन्दर याद की तस्वीरें यहाँ ब्लॉग में साझा कर रही हूँ ...
कई रंगों के साथ सिर्फ एक फोटो जिसमे मैं हूँ वह मेरी खींची नहीं :)) .. have a good day ... Nutan |
Thursday, January 12, 2012
तुम आई जब से मेरे आँगन में - डॉ नूतन गैरोला
| मेरे आँगन में रोज जब चिड़िया चहकती थी मैं बस सोचा करती थी ये बोलती हैं क्या? तुम आई जब से मेरे आँगन में समझ आने लगा है मुझे चिड़ियों की चहक में होता है क्या … बचपन मेरा बीता दौड़ते भागते रंगबिरंगी तितलियों के पीछे तुम आई जब से मेरे आँगन में जाना है मैंने बचपन की वह सुनहली मासूम चंचल तितली दौड़ भाग उछल रही है इर्द-गिर्द मेरे पीछे पड़ी रहती हर वक़्त ऐसे कि मैं उसके लिए रसभरा फूल हो गयी हूँ जैसे मेरी गोद में बैठ मेरे साथ वो कितना खुश होती है देख ये मैं भी तृप्त होती हूँ | …….
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उसके लिए - फूलों से खिलती है तेरी हंसी तेरे होने से महकता है सारा घर मासूम आँखों में अटके जब भी आंसू के दो बूँद दिल मेरा दुःख का दरिया होता है .. तुम मेरे लिए सुबह की धूप हो तुम दोपहर की धूप में छाया हो तुम रात की खिलती चांदनी हो तुम तम को मिटाती आभा हो
तुम मरु पर बरसता पावस हो|
तुम पतझड़ में खिलता बसंत हो
तुम चन्दन में बसी महक सी हो
तुम मेरी प्यारी गुडिया हो ||
आ तुझे मैं काला टीका लगा दूं
दुनियाँ जहां की नजर से बचा लूँ|
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……. डॉ नूतन गैरोला १२ / जनवरी /२०११
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मुझे मिली परी …पिछले साल की पोस्ट .. ११-०१-२०१२ डॉ नूतन गैरोला सभी ब्लॉग मित्रों को नववर्ष पर शुभकामनाएं और शुभदिवस |
Friday, January 6, 2012
मेरा प्रेम मेरी चाय - डॉ नूतन गैरोला
| जब चाय बनाना एक ड्यूटी था कैसे दिन थे वो ..मेडिकल कॉलेज में प्रथम वर्ष .. रेगिंग बहुत हुआ करती थी .. और हम बेचारे पहले साल में जो पदार्पण किया कि सर पर ओले गिरने लगे .. एक तो नजर जमीन पर और ठुड्डी छाती से सटी होनी चाहिए जिससे गर्दन के तो मारे दर्द के बुरे हाल हो जाते थे ..तिस पर सीनियर को एक नजर पहचान भर के लिए भी नहीं देख सकते थे … उनकी पहचान या तो उनकी आवाज होती थी या उनके जूते या पैर| उनसे पूछना उनका परिचय तो - आ बैल मुझे मार जैसी स्तिथि हो जाती थी तो उन्हें सिर्फ पैरों जूतों और आवाज से पहचानना पड़ता था .. और किसी भी कार्य के लिए हम मग्घे ( मेडिकल भाषा में मग्घे का मतलब बेवकूफ) बालों में लगे टपकते तेल के साथ ( जो कि अनिवार्यता थी प्रथम वर्ष की छात्रों के लिए कि उनके सर के बाल कस कर बंधे हों और तेल से नहाये हों, पूरा मुह भी तेल तेल हुवा रहता था व सर नीचे और घुटनों से नीचे तक झूलता हुवा एप्रिन)… तो क्या कह रही थी -- हां बता रही थी कि अगर किसी कार्य के लिए प्रथम वर्ष का छात्रा कमरे से बाहर निकली नहीं कि सीनियर के हत्थे चढ़ जाती थी .. अगर रेगिंग नहीं हुवी तो गनीमत फिर भी स्नानागार तक या मेस तक जाते जाते कई सीनियर लड़कियों के साथ उनके कार्य निबटाने का अनुबंध हो जाता था ( मन से नहीं भय से और रेगिंग की आवश्यकता की वजह से) ..अनुबंध में तीन काम खास होते थे १) चाय/ कोफी बनाना २ ) बाजार जा कर उनके लिए परचेसिंग करना ३) नोट्स कॉपी करना ४) रेगिंग के लिए तैयार ५) अन्य कोई भी काम कोई सीनियर कहती ए लड़की कहाँ से आयी है तू और किस कमरे में रहती है .. हम अपना परिचय उनको बताते - वो भी मेडिकल भाषा में - फिर वो कहती आज रात डेढ बजे मेरे कमरे में चाय बनाने आ जाना … जी हाँ सर हिलाना ..और आगे बढ़ना कि दूसरी पकड़ लेती फिर वही अपना परिचय कि …मैं सड़ी गली चमन नूतन चमन अपने माता पिता की सड़ीगली संतान अपने सड़े गले शहर से ..जमात पास कर के आपके पवित्र पावन शहर कानपुर में मिया बीबी बच्चों सहित अपना घर बसाने आई हूँ .. वह भी एक खास अंदाज में उड़ते हुवे उन्हें सलाम बजाते हुए | फिर वही हुक्मनामा कॉफी बनाने आ जाना रात २ बजे .. जी कह कर सर हिलाना ..अपने मस्तष्क की डायरी में नोट कर लेना कि कैसी आवाज थी कौन सीनियर थी कहाँ कहाँ कमरा होगा कितने बजे का समय मिला.. इसी पशोपेश में होते की फिर कड़क आवाज और वही हुक्मनामा चाय बना देना ३ बजे आ कर .. जी हाँ … आगे बड़े की फिर एक सीनियर ने पकड लिया .. चल तू मेरे कमरे में कभी नहीं आई आज मेरे कमरे में डेड बजे चाय बना देना ..तब बेचारी प्रथम वर्ष की छात्र कहती कि डेड बजे तो मुझे पहले ही “अ जी” ने बुलाया है … तो डाँट पड़ जाती ज्यादा होशियारी मत बघार जो कहा गया वही करो .. और जब तक मेस या स्नानागार पहुचते झोली में चाय या कॉफी बनाने के बीसियों अनुबंध … अब तो सारी रात आँखों में गुजर जायेगी कल सुबह खुद बिना पढ़े कॉलेज जायेंगे और प्रोफ़ेसर की डाँट खायेंगे .. चलो ये ही सही कम से कम रात भर काम करेंगे तो रेगिंग से तो बच जायेंगे लेकिन यह भी तो रेगिंग ही थी … मेस में या बाथरूम में साथ की सहेली मिलती उस से पूछ कर कन्फर्म करते कि किस कमरे में कौन सी सीनियर है ..वो झट से एक पर्ची निकालती जिसमे सीनियर्स के कमरा नंबर उनकी विशेषताएं लिखी रहती और यह भी कि वह कितनी खतरनाक होंगी | वापसी में भी वही सिलसिला और गलती से जब कहा की आज तो फुर्सत नहीं होगी रात भर में कई सीनियर ने चाय बनाने के लिए कहा तो फिर तो हल्ला मच जाता कि बहुत बकैत है यह जूनियर …चलो कमरा नंबर ५ में …वहाँ पहुँचते तो वहाँ अपने जैसे किसी एक को ना कहने वाली जूनियरों की भीड़ मिल जाती जिनकी अच्छी खासी रेगिंग कई सीनियर मिल ले रही होती.. बस तब तो डाँट खाते रहते ..पैर खड़े खड़े थक जाते और उलजलूल करतब करने को कहा जाता .. फिर घडी में नजर डेड बज गया ..उन्होंने चाय के लिए कहा था और उन्होंने डेड बजे काफी के लिए …जैसे तैसे कहते कि हमें चाय/ काफी बनाने के लिए बुलाया है ..पक्का करने के लिए एक जूनियर को भेजा जाता और कन्फर्म होने पर उस कमरे की कैद से निकल पाते लेकिन स्तिथि वही कि आसमान से गिरे खजूर पे अटके… अब ब जी की चाय बनानी है और र जी की कॉफी लेकिन ब जी तो दूसरे फ्लोर में रहती है वो भी नए खंड में ..जबकि र जी तो पुराने खंड में दूसरे हिस्से में तीसरे फ्लोर में रहती हैं … बस दौड भाग शुरू …बी जी त्योरी चढ़ा कर कहती है देर हो गयी उनके चाय का हीटर में पानी रखा चाय पत्ती डाली और दौड़े ओल्ड ब्लोक की और ..र जी खूंखार हो राखी हैं ..देर कर दी ..चलो अब माफ नहीं करुँगी.. कॉफी इतनी घोटो की सफ़ेद हो जाए ..लेकिन शोर नहीं मचना चाहिए चम्मच का .. पढाई में डिस्टर्ब नहीं करना … कमरे से बाहर फेंटो कॉफी .. और कमरे से बाहर निकलना सही रहता .. मौका मिल जाता फिर दौड कर ब जी की चाय बनाने और र जी की कॉफी फेटते हुवे .. बी जी चिल्लाई चम्मच कप का शोर नहीं .. तो हाथ रोक दिए ..चाय बनायीं ..उनको चाय छान कर दी उनके मेज पर ..उन्होंने किताब से नजर नहीं हटाई ..फिर उनका दरवाजा उड़का कर र जी की और भागी ..कॉफी अभी सफ़ेद नहीं हुवी थी ..उचित जगह देख कर रुकी तेज तेज हाथों से कॉफी फेंटी और दौडी उनके कमरे की ओर..जल्दी से दूध चढ़ाया ….और बस प्रथम वर्ष में यह में यह भागमभाग ही रहा करती थी… कभी सीनियर्स की चाय, कभी कॉफी, कभी नोट्स लिखते कभी उनके लिए परचेसिंग करते मेडिकल कॉलेज का प्रथम वर्ष इतनी जल्दी बीत गया कि मालूम ही नहीं पड़ा लगा कि साल इतना छोटा क्यों होता है, सारी रात जागरण होता था - आज लगता है कितने हसीन थे वो दिन |
Friday, June 17, 2011
चंद्रग्रहण /Lunar Eclipse- 15 june 2011 –My Clicks My Photos- Dr Nutan Gairola
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