Showing posts with label लेख - संस्मरण. Show all posts
Showing posts with label लेख - संस्मरण. Show all posts

Sunday, November 14, 2010

हम भी कभी बच्चे थे | बाल दिवस के अवसर पर |

बच्चे छल कपट से दूर भगवान का नन्हा रूप है और किसी भी समाज और देश का आधार हैं |आज का बच्चा कल का नागरिक है देश का सूत्रधार है | माँ पिता का सहारा है |  बचपन के इस रूप को ,चिल्ड्रेंस डे - बाल दिवस के रूप में  विश्व भर में अलग अलग तारीखों में मनाया जाता है | इंटरनेशनल – अंतर्राष्ट्रीय बाल दिवस १ जून को, यूनिवर्शल – विश्वव्याप्त बाल दिवस  नवंबर  २० तारीख को मनाया जाता है | किन्तु हमारे देश भारत में बाल दिवस बड़ी धूम-धाम से १४ नवम्बर को मनाया जाता है ..कारण.. इस दिन देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु का जन्मदिन है जो कि बच्चो को बेहद प्यार करते थे और बच्चे भी उनेह बहुत प्रेम और सम्मान देते रहे ..वो बच्चो के प्रिय चाचा नेहरु थे | उनकी मौत के बाद 1964 से उनकी  जयंती  “ बाल दिवस “  के रूप में मनाई  जाती है चाचा नेहरु को हमारी श्रधांजली और बच्चों को प्यार |

childrens-day-celebration

बचपन के संस्मरण

आज बाल दिवस पर मैं अपने बचपन के एक दो किस्से आप सभी से शेयर कर रही हूँ |
 क्यूंकि हम भी कभी बच्चे थे |


माथे का  दाग -


                    Crying, for a Child in War
बालमन - कहीं देखा सर्कस में रस्सी पर झूलती लड़की- मैंने चाहा की मै भी उस लड़की के जैसा कारनामा करूँ| तब में LKG में पढ़ती थी | उम्र लगभग तीन साल से चार साल के बीच | माँ ने हम दोनों बहनों को तैयार किया स्कूल जाने के लिए | मेरी कंघी पहले की और छोटी बहन के वो बाल बना ही रही थी कि मै बाहर बरामदे में आ गयी | ८-१० सीढ़ी  नीचे सड़क थी और  बरामदे में एक गोल स्तंभ था | उस स्तंभ के पास खड़ी नीचे सीढियाँ को देख जाने क्यों वो सर्कस के करतब याद आये .. और अपने ऊँगली में मैंने बदरीनाथ भगवान की अंगूठी देखी सोचा क्यों ना इसे खम्बे में अटका कर झूला झूलूँ  जोर जोर से जैसे सर्कस में  हतप्रभ करने वाले करतब देखे, उनकी तरह  | और मैंने अपनी ऊँगली सीधी  की और अंगूठी को खम्बे में फ़साने का जत्न करते हुवे लटक गयी और झूलने लगी - अरे ये क्या ! मै तो धडाम से उंचाई से १० सीढ़ी नीचे गिर पड़ी | सीधे  सीढ़ी के कोने से सर जा टकराया |जाने क्यों दर्द नहीं हुवा मुझे | सड़क पर आते जाते लोग ठिठक गए | और मैंने चाहा दिखाना कि मै कोई छोटी बच्ची नहीं हूँ | सीधे खड़ी हुवी और  सीढ़ी की ओर मुडी |सीढ़ी चढ़ने लगी कि नजर गयी ऊपर वाली सीढ़ी पर जहाँ पर मेरे सर से खून का फव्वारा झड रहा था |माथे के बायीं ओर से तेज खून की  धारा फव्वारे के रूप में निकल रही थी| तब तो चोट की डर नहीं माँ की डांट के डर से सिहरन उठने लगी | दरवाजे से अंदर पहुंचते  ही माँ ने मेरे चेहरे की जगह बहती खून की धारा देखी तो घबरा गयीं | हाथ से उन्होंने मेरा माथा दबाया पूछा ये क्या हो गया , कैसे हो गया .. बड़े भाईसाहब को आवाज लगाने लगी | एक साफ़ साडी को चीर कर माथे पे पट्टी बाँधी भाईसाहब और माँ ने | छोटी बहन थी घर में और माँ ने किचन में खाना भी चढाया था अतः भैया को आवश्यक हिदायत दे कर खुद मुझे गोद में ले बहुत तेज क़दमों से पास के क्लिनिक, जो की शायद आधा किलोमीटर दूर था ले गयी|
मैं माँ की गोद में थी और मेरा सर माँ के कंधे पर था, माँ के खुले बालो से टपकता खून मुझे आज भी दिखाई देता है| दौड़ती भागती माँ डॉक्टर के पास पहुची तो डॉक्टर किसी अन्य केस में व्यस्त था  और मेरा इलाज शुरू होने में  देर हो गयी | जब मेरा नंबर आया तो डॉक्टर को टांके मारने /सिलने के लिए सुई ही नहीं मिली | और कहा कि सुई  लाने तक बच्ची के शरीर से काफी खून बह जायेगा| अतः उन्होंने मेरे घाव की पेकिंग कर दी और ऊपर से पट्टी कर दी | जिसकी वजह से उस समय मेरा खून तो रुक गया पर मेरे माथे पर एक गहरी चोट का निशान रह गया |अब आई पूछताछ की बारी, जब शाम को घर पे पूछा गया कि कैसे गिरी | मेरी गिग्घी बंध गयी| ऐसा लगा कि इस तरह से झूला झुलना और मूर्खता करना अपराध था |जाने कौन सा भय मुझे कचोटने लगा कि मार अब पड़ी तब पड़ी|
          और भय में मैंने अपने को बचाने की एक युक्ति निकली | कह दिया किसी ने मेरा हाथ खिंचा था | ये कहना क्या था कि माँ डर गयी | बोली किसने खिंचा था बता | याद कर | कहने लगे सूरत किस से मिलती जुलती थी | अब तो झूठ  बोल चुकी थी अब बचने की और सूरतें भी खतम हो गई| कह दिया कोई  देखा देखा सा है | पूछा किसके जैसा उस बच्ची ने कहा दूध वाले के बेटे जैसा | बोला कि झूट तो नहीं बोल रही है | वैसे झूठ बोलना आदतों में सुमार ना था| झूट बोला मैंने कांपते दिल से| कुछ कुछ उसके जैसा था | नहीं चाहती थी कि बात आगे बढे पर बात थी कि रुकी नहीं | और उस छोटी बच्ची को अगले दिन दूध वाले के घर ले जाया गया | धुंधली यादें है कि आँगन में उनके बच्चे खड़े थे और मैं माँ से चिपकी रो रही थी अब डर था कि उन बच्चो को मेरी वजह से मार न पड़े | जब जब वो पूछे की पहचानो मैं और डर कर जोर जोर से रोने लगती | आखिरी में दो तीन बच्चो के बीच मैंने कहा कि इनके जैसा था पर ये नहीं और उन बच्चो को भी राहत मिल गयी |
        उस दिन का वो झूठ जो अनायास  बोला, मै जिंदगी भर झूठ बोलने से डर गयी | तीन साल की थी डर ऐसा व्याप्त था कि इसे कभी भुला नहीं सकी | मै खुद को उन बच्चो का गुनाहगार मानती रही और ये सर की चोट सदा याद दिलाती रही हादसे की और आज भी मुझे झूठ से सख्त नफरत है |


दीदी का खून पीते तो मोटे होते |


                  imagination
ये जो माथे की चोट का संस्मरण लिखा मैंने, उसी सन्दर्भ में - मेरी छोटी बहन ने ऐसा खून बहते कभी नहीं देखा | शायद डरी होगी, किन्तु रात को जब पिता जी ड्यूटी से घर वापस आये तो माँ ने उन्हें मेरे बारे में बताया | मेरे सर पर लगी चोट देख कर वो बहुत व्यथित और दुखी हुवे | और मुझे गोद में ले कर बैठ गए| तभी छोटी बहन पीछे से दौड़ती हुवी आई और पिता जी पर लिपट गयी | बोली पिता जी | आप दिन में क्यों नहीं आये | दीदी को चोट लगी थी | कितना खून बहा - उसने हाथ फैला कर कहा इत्नाआआ साअराआअ बाल्टी भर के| आप होते तो आप कितना खून पीते और कितने मोते हो जाते | खून पीते ?? पिता जी की एक नाराजी से भरी  थपकी उसके सर पर - याद है


  मुर्दे की खीर 


               crying_child

बचपन कितना सरल और भोला होता है..झूठ सच नहीं जानता || जिसने जैसा बताया मानता है  | विस्मित होता है किन्तु विश्वास करता है  क्यूंकि उसके लिए दुनिया की हर चीज नयी और विस्मय से भरी होती है |

एक रोज घर में, छुट्टी पर पिताजी और सभी  थे | किन्तु दिन में  ( र ) भाईसाहब जी, जो कि तब पांच साल के रहे होंगे बाहर खेलने गए |थोड़ी देर बाद किसी बच्चे कि हृदयविदारक चीख और रोने कि आवाज से सब चौंक गए | भाईसाहब (र) रोते हुवे घर आ रहे थे | उनका मुँह खुला का खुला था | पिता जी ने कहा, क्या हुवा ? क्यों रो रहे हो ? किन्तु भाईसाहब और जोर जोर  से रोने लगे - बेहद भयभीत थे और उनका सारा शरीर अकडा हुवा था पिता जी ने जैसे ही  (र) को छुवा वो पैर भी पटकने लगे | सब घबरा गए कि कही सांप ने तो नहीं काटा होगा ? क्या हुवा होगा ? पूछते रहे पर वो सुन भी नहीं रहे थे, अब तो मुँह  भी खुला था और पैर भी पटक रहे थे  और पूरा शरीर ऐंठा जा रहा था और डर से पसीने भी छूट रहे थे - पिताजी ने फिर गुस्से में कहा  ताकि वो अपनी समस्या के बारे में बताएं  बोल क्या हुवा | तो (र)भाईसाहब  के मुंह से एक वाकया फूटा – “ मुर्दे की खीर “ |मुर्दे की खीर जैसे शब्द  से सभी नावाकिफ  थे, सब घबरा गए - भैया ने बाहर की तरफ इशारा कर के बताया मुर्दे की खीर | बहुतेरी कोशिश की गयी कि वो बताएं कि क्या हुवा उनके साथ  ..लेकिन डर के मारे उनका शरीर  अकडा हुवा था बस अब एक ही शब्द बोल कर चिल्ला रहे थे - मुर्दे की खीर - फिर एक जोर की थपकी पडी गाल पे | एक दम भाईसाहब को होश आया | माँ भी बोली कि  बताओ क्या हुवा क्यों इतना रो रहा है | भाईसाहब ने बाहर इशारा किया मुर्दे की खीर और डर के मारे माँ की गोद में छुप गए जैसे अब मुर्दे की खीर से कोई अनर्थ होने वाला है और चिल्ला रहे थे मुझे बचाओ |
               पिता जी बाहर गए कुछ बच्चे  वहाँ पर भयभीत थे | पिता जी ने उनसे पूछा क्या बात है बच्चो क्यों डर रहे हो | तब एक बच्चा फटी फटी आँखों से बोला अंकल जी, अभी यहाँ से लोग एक मुर्दे को उठा कर ले जा रहे थे और  उस पर चावल डाल रहे थे |
                   तब पिता जी ने सड़क पर देखा तो बहुत चावल के दाने फैले हुवे थे | चावलों को देख पिता जी ने  कहा तो क्या हुवा चावल के दानो से ? बच्चो ने बताया की एक बहुत बड़े भाईसाहब यहाँ पर खड़े थे उन्होंने कहा की बच्चो ये चावल के दाने मुर्दे की खीर हैं | ये मुर्दे का खाना है | इस लिए इस बात का ख्याल रखना कि इस पर पैर न लगे नहीं तो मुर्दा उस बच्चे को खा जायेगा  | ( किसी ने बच्चो के साथ मजाक की थी ) बच्चों ने बताया कि उस समय वो लोग सड़क के उस  पार खड़े थे | सड़क को पार करने के लिए उन्हें बहुत मेहनत करनी पड़ी | एक एक कदम उन्होंने सड़क पर बैठ बैठ कर चावल के दानो को देख कर कर रखा जो कि बहुत कठिन था | किन्तु बेचारे ( र )का पैर एक चावल के दाने पर छू गया था ..उसके साथ रास्ता पार करते उसके दोस्त (म ) ने भी देखा | म चिल्लाया और र घबरा गया वह चीखता हुवा  घर भागा |बच्चे बोले - अंकल  हमने तो सड़क पार कर दी पर र का अब क्या होगा?  पिता जी के हँसते हंसते बुरे हाल हो गये | किन्तु र भाईसाहब को मुर्दे की खीर के भय से आजाद करने में समय लगा |

घटना के समय मैं बहुत छोटी थी | जो सुना वो बताया |
 
बुढ़िया और झोपड़ी

जब मैं छोटी  थी -मेरी बचपन में लिखी एक कविता |


 
               teenage
अरे ! वो जलते दीये
किसने बुझा दिये हैं ?..
वह वृद्धा उस झोपडी में
उस घुप्प अन्धकार में ?
जिसने कल्याण किये हैं ..||


वो अट्टालिका वो इमारते
जगमगाती रोशनी है जिसमे,
असंख्य विद्युत बल्ब हैं , पराया
रक्त चूस कर जिसमें ||


वह वृद्धा उस अन्धकार में
उठती कुछ टटोलती |
गोद में ले एक रोग पीड़ित
परोपकार का बच्चा ||


उठती वह खांस कर,
कुछ कदम लड़खड़ा कर |
वापस लौट आती है वो
इमारत में झाँक कर ||


आज अब वो झोपड़ी
निरंग और सुनसान है |
बुढ़िया का न बच्चे का
उस झोपड़ी में कहीं
नाम और निशान है ||


काश !ऐ इमारत वालो तुम में
कुछ दया भाव होता |
तुमने बंद खिड़की को खोल
कुछ प्रकाश पुंज बिखेरा होता |
तो आज इस धरती पर एक
पवित्र आत्मा का तो निवास होता ||


द्वारा .. Miss Nutan Dimri / डॉ नूतन गैरोला


यह कविता मै, जब १५ साल की थी, तब लिखी थी 
पुरानी डायरी के पन्नो से उतारी है |
और डायरी के वो पेज भी मैंने फोटो में डाले हैं 
पुराने यादे - कविता बचपन की  


 बाल दिवस पर हार्दिक शुभकामनायें और बधाइयाँ

 


99galleries.com | Forward This Picture To Your Friends

Sunday, October 31, 2010

पहाड़ / उत्तराखंड/ गढ़वाल ( गाँव ) की एक दीपावली - २००९ Dr Nutan Gairola

  पहाड़ / उत्तराखंड/ गढ़वाल ( गाँव ) की एक दीपावली - २००९

घर की सफाई, रंग-रोगन कुछ दिन पहले से शरू हो जाता है | फिर दीपावली के दिन सुबह सवेरे स्नान ध्यान के बाद बनती हैं फूल मालाएं | बच्चे लोग फूलों की मालाएं बनाते है और दीये के लिए बाती | माँ पिता घर की सफाई करते है और रसोई में बनती है -पूड़ी पकौड़ी .. इसके साथ ख़ास बनता है " पिण्डा " - पिण्डा गाये, बैल, बछिया को खिलाने के लिए पके हुए  चावल / भात , झंगोरा / ज्वार और आटे का हाथ से बनाया हुआ बड़ा बड़ा लड्डू होता हैं | पिंडों की थाली भी विशेष रूप से सजाई जाती है| हर पिण्डे पर एक फूल ( अक्सर गेन्दा ) रोपा हुआ  होता है |गाय की पूजा की जाती है| फूल मालाएं पहनाई जाती हैं | तिलक लगा के उनके सींगों पर तेल या घी की मालिश करते हैं .. और फिर उन्हें  " पिण्डा" खिलाया जाता है |


गौ पूजन और पिण्डा खिलाते हुए 


दरवाजों/ देल्ली  के चौखटों को और लकड़ी के खम्बों को सुन्दर पीले, लाल और सफ़ेद रंगों से क्रमशः हल्दी, रोली और आटे के बिंदियो से सजाते ( बिर्याते ) हैं | दरवाजे के दोनों कोनों पर थोडा सा गोबर लगा कर उसे रंगों से बिर्याते है और जौ से सजाते है व दरवाजे और पूजा घर को फूल मालाओं से सजाते है |

दिन में लडकियां और महिलाएं घर की सजावट में गेरू से रंग कर, पिसे चावल से रंगोली सजाते है | रंगीन मिट्टी भी कहीं कहीं पर इस्तेमाल करते है | या फूलों की रंगोली भी  और लक्ष्मी के पैरों के निशान घर के बाहर से भीतर जाते पूजाघर या अनाजघर तक जाते हुवे अंकित करते हैं |




दीये से सुसज्जित रंगोली, पूजा और घर



शाम को पूड़ी ( स्वाल ), पकौड़ी, हलवा बनता है| लजीज व्यंजन बनाये जाते है | पानी की धारा ( मंगरा ), हल के फल और जोल की व ओखली और मुसल ( गंज्याला ) को भी सजाया/ बिर्याया जाता है | इनकी पूजा की जाती है क्यूंकि किसानों के लिए गाय बैल हल, पानी और अनाज को कूटने वाला ओखल बहुत महत्वपूर्ण हैं |

पूड़ी, पकौड़ी, खील, बताशे, मिठाइयाँ और दीयों के थाल सज जाते है| पूजा की सामग्री के साथ पैसा या जेवर, सोना आदि भी रखा जाता है | गणेश जी और लक्ष्मी जी की पूजा होती है |



 जगमग दीये और गणेश लक्ष्मी की पूजा



फिर दीप मालाएं सजाई जाती हैं | घर का कोना कोना दीपज्योति से जगमगाने लगता है| आज कल फुलझड़िया, अनार, बम-पटाखे भी फोडे जाते है |






फूलझड़ी, अनार जलाते हुवे बच्चे 




किन्तु गाँवो में भेल्लो / भेलो खेलते है | जिसमें लकड़ियों का एक छोटा गट्ठा बाँध कर घुमातें हैं | गाँववासी इसका बहुत आनंद लेते है | दुसरे गाँव वाले भी, और सभी गाँव से बाहर इकठ्ठा हो कर नाचते हैं  और रोशनी का त्यौहार भेल्लो के साथ मानते है और " भेल्लो रे भेल्लो " गीत भी गातें हैं |




पारंपरिक भेल्लो खेलते हुए 



घर में बनी पूड़ी, पकौड़ी , खील- बतासे, मिष्ठान आदि का आदान प्रदान करतें हैं और दिवाली मिलन करते है | बच्चो को ये त्यौहार खासा पसंद आता है |

 दीपावली पर हार्दिक शुभकामनाएं  

प सभी का त्यौहार मंगलमय हो | खुशियों को लाने वाला, मन के अंधेरो, राग द्वेश को मिटाने वाला और आपसी प्रेम को बढाने वाला हो | दीपमालाएं प्रज्वलित कीजियेगा किन्तु नाहक बारूद को जला जला कर वातावरण प्रदूषित न किया जाये तो हम सबके लिए और हमारी पृथ्वी के लिए बेहतर होगा | आग से, बारूद से बचें और एक सुरक्षित, पर्यावरण संरक्षित और सौहार्दपूर्ण दीपावली मनाएं -

                  शुभकामनाएं सहित - डॉ नूतन गैरोला

     सभी फोटो मेरी निजी एल्बम से सिर्फ आखिरी फोटो को छोड़ कर - डॉ नूतन गैरोला

Monday, April 5, 2010

लुत्फ़ बीमारी के..DR Nutan NiTi

हाय रे- जब भी मै रात्री इमरजेंसी करती हूँ .. घर जाती हूँ सुबह का उजाला दिल जला रहा होता है और में गृह कार्यो में अपना हाथ  बंटाने  लगती हूँ फिर दिन की OPD करती हूँ और आते जाते कोरिडोर से वार्ड पर निगाहें जाती है तो मेरा दिल बैठने लगता है ..अभी परसों की ही तो बात है एक नेता जी की बीबी को थोडा सा हल्का बुखार था और सारा हॉस्पिटल दौड़ाया हुवा था ..बाकी के मरीज भी नेता जी के हल्ले के आगे अपनी तकलीफ को हल्का पा रहे थे ... और मै तो उस लुत्फ़ का अंदाजा ले रही थी जो  महोतर्मा साहिबा को मिल रहा था .. हम एक पैर पर उनके सिरहाने पर थे खड़े सर झुकाए ..जैसे कोई गुनाह हमने ही किया हो .. ये बुखार उनको हुवा नहीं मानों हमने दिया हो और अब हम को ही सजा भुगतनी है... हाय रे विधाता ! क्या यही विधान है ..मै इतनी स्वस्थ क्यों ..कब मेरा नंबर आये और हो जाऊं मैं  बीमार .. भगवान् को लड्डू चढ़ाउंगी .. हे प्रभू ! हे दीनो के नाथ !! कुछ तो रहम कर और कर दो हमें भी बीमार .. हो जाये हल्का सा बुखार .. आये एक दो उलटिया .. और हो जाये लाल आँख .. यूं तो हम ज्यादा न हो बीमार पर दिखे जैसे हो हम अत्यंत बीमार .. कुछ साहस हमें भी देना प्रभो कि आये न हमें पर हम चक्करघिन्नी खाए और जहाँ बहुत भीड़ हो वहीँ पर गिर जाये और जमीन पर लोटपोट जाये.. तब क्या आनंद होगा .. हम को भी इधर उधर से लोगो ने पकड़ा होगा.. कोई पंखा झलता होगा .. कोई चिल्लाता होगा हटो हटो ..रास्ता छोड़ो ..लगता होगा कि आये है किसी प्रदेश के मुख्यमंत्री .. और होगा मेरा भी वैसा ही राजसी आव -भगत, सेवा - सुश्रुषा .. कोई निम्बू पानी लाता होगा .. कोई गाड़ी में हमें सहारे से लिटाता होगा .. अस्पताल कि घंटिया घनघनायेंगी मानों कि टाए टाए कर मंत्री की गाड़ी की लाल बत्ती झिलमिलाई .. डॉक्टर भी अदब से नब्ज देखते होंगे... और डर डर के प्रश्न करते होंगे बीमारी का इतिहास रिकॉर्ड करते होंगे और खून जांच के लिए सेम्पल निकालने वाले के होश फाकता हो रहे होंगे लगता होगा मानों वो सुई नहीं चुभा रहा वरन कोई नस्तर घोप रहा हो खून की  नदियाँ  बहा रहा हो २ मिली खून निकालाना ऐसा लग रहा हो जैसे २ लीटर खून ज़ाया कर दिया हो ..डर से उसका रंग पीला पड रहा हो मानो अभी अभी टेक्निसियन ही दो यूनिट रक्तदान कर खड़ा हो .. मै सर उठाऊ तो घर वाले कहेंगे लेटे रहो लेटे रहो... मेरी एक आह पर सारा हॉस्पिटल दौड़ता होगा ..... कई कहेंगे अरे हुवा .क्या......डॉक्टर के चेहरे पर घबराहट होगी कहने में भी असमर्थ कि इन्हें ऐसी कोई बीमारी नहीं जिसमे इन्हें अस्पताल भर्ती किया जाए .. मै हाथ उठाऊँ तो लोग कहे अरे अरे जरा धीमे से... कोई मेरे हाथ के नीचे तकिया लगाये ..कोई मेरी सिरहाने पे तकिया को सही लगाएगा.. कोई चम्मच से मुझे फलो का रस पिलाएगा कोई अंगूर लाये कोई जूस .. और बड़े प्रेम से सब मुझे खिलाने की कोशिश .. अरे वाह क्या ठाट होंगे लेटे लेटे ही चीलमची में दन्त मंजन होगा .. गुनगुने तोलिये से कोई मुह पौंछता होगा.. पाऊडर , सेंट, डी - ओडो छिडकता होगा , फिर आएगी बारी तेल की...मेरे सर पर तेल डाल कोई सर दबाता होगा.... कोई रिश्तेदार कहती होंगी कि क्या पैर दबा दूं .. दूर दूर से लोग मुझे मिलने आते होंगे ..मित्र और रिश्तेदार ग्रीटिंग कार्ड लाते होंगे ..झुक झुक कर कहते होंगे - गेट वेल सून .. किसी के हाथ में फूल तो कोई बुक्के लाते होंगे .. मेरे एक हाथ में फोन होगा और रिश्तेदारों और मित्रो के फोन आते होंगे कैसी हो ..जल्दी ठीक हो जाओ .. और लोग शुभकामनाये देते होंगे .. और दुसरी तरफ मेरे  मुंह  में अनार के दाने मेरी भाभी डाल रही हो .. मेरा तो मन बाग़ बाग़ हो जायेगा.. मन कि बगिया में फूल खिल जायेंगे.. और मै फूल लेने खड़ी हो जाऊंगी..ख़ुशी से नाच उठूँगी ...डॉक्टर देख लेगा खुशी से कहेगा मरीज चंगा हो गया है..अब इन्हें कर देते है हम डिस्चार्ज ( मानों उनका सर दर्द जल्दी चला जाए ) ...तब तक आएगी आवाज धढ़ाम और मै फिर गिर जाऊंगी....... चुपके से एक आँख से देखूँगी कि कोई मुझे उठाने आया... और नहीं तो लगूंगी करहाने जोर जोर से... अरे...अरे समझा करो बीमारी के भी होते है अपने लुत्फ़ ...आराम का आराम और वी-वी-आई-पी ट्रीटमेंट चाहे कोई बीमारी हो न हो ...... " डॉ साहब  ऑपरेशन   थीअटर में  तैयारी हो गयी  है और मरीज शिफ्ट कर दिया... ( स्टाफ नर्स सामने खड़ी थी )  .. ओह! इतना आनंददाई क्षण था ये - अफ़सोस ख्वाब भी नहीं देखने देते ये  सब मुझे ...अभी अब जाना  पड़ रहा है....ड्यूटी जो बजानी है कर्तव्य - परायणता भी कोई चीज होती है  ..ओपरेशन थीएटर के बाहर लोगो के हाथ में बुक्के -मरीज के लिए .....काश कि चक्कर आ जाते मुझे  कि बुक्के मिल जाते मुझे  .. पर जाना है काम पर  और जा रही हूँ... बाई बाई .. जरा मेरे लिए शुभकामनाये दे दीजिये ..मेरे बीमार होने के लिए नहीं ..मेरे मरीज की जल्दी खुशहाली के लिए .........

Created by ॥ Dr Nutan Gairola 04/ April /2010
....... ********..........*******.............

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails