Monday, June 30, 2014

अनुनाद में मेरी दो कवितायें …



   प्रिय मित्रों - मुझे बताते हुए बहुत खुशी हो रही है कि अनुनाद ब्लॉग में मेरी दो कवितायें प्रकशित हुई है… आशा है कि आपको भी ये कवितायेँ पसंद आएँगी … .. जरूर देखिएगा और अपनी राय दीजियेगा वहाँ …



 अनुनाद में डॉ नूतन गैरोला की दो कवितायें


Monday, March 10, 2014

अन्तराष्ट्रीय महिला दिवस की चमक और नारी निकेतन का अन्धकार



                         सूफी से गोल गोल घूमते हुए नाचते हुए भक्त, किसी दूर से आती हुई ढोलक की थाप पर , भक्तिमय इस माहोल पर दिल बाग़ बाग़ हुए जा रहा था कि जाए हम भी जा कर वहां बैठ जाए .... कुछ हम भी भक्तिमय हो जाए ... पर मुझे तो अपना कार्य देखना होता है ... मुझे मरीज देखने थे वहां .. जी हां .. नारी निकेतन मैं थी मैं उस वक्त और वह नाचती हुई महिलायें नारी निकेतन की ... मैं एक मेज पर बैठी थी हिदायते चारो ओर थी तस्वीर खींचने की मनाही .. प्रवेश द्वार पर भी एक हिदायत कि बिना मजिस्ट्रेट की आज्ञा के प्रवेश वर्जित ............. खैर, हमें तो तकलीफों ( शारीरिक ) से बाबस्ता होना था .... सूनी आँखें कहती थी कि ये तकलीफें बहुत कुछ अपनों की चाहत में बड गयी ... फिर चीखने की आवाजे .. बार बार चिल्लाती औरते, लड़ती औरते, रोने की आवाजें और वो भक्तों की तरह झूमती औरतें ... वह भक्तिमय नहीं था जो दूर से नज़र आता था, वह घोर मानसिक अवसाद और वितृष्णा थी ................................... एक तरफ अन्तराष्ट्रीय महिला दिवस पर बहसों की चकाचौंध ............................ दूसरी ओर अपने गम के अंधेरों में खोयी हुई ये महिलायें, शारीरिक मानसिक कष्टों में भोजन और जीवन के लिए लड़ती स्त्रियाँ ... जिनकी इरले बिरले ही कोई सुनवाई हो ....... समाज में इनके लिए कहाँ जगह थी कोई स्वीकारोक्ति ही नहीं थी जब इनके घर वाले भी इनको दर दर भटकने के लिए छोड़ गए ... ऐसे में मुझे वह पगली सी सड़क की लड़की ( २५ साल उम्र लगभग ) बहुत याद आई .... जो हरिद्वार से रात २ बजे लाइ गयी थी ...... प्रसव पीड़ा थी पर और दो बार उसका सीजेरियन ओपरेशन हो चुका था ... वह चिल्ला रही थी, क्रोध में भाग रही थी ..अपने पर हाथ नहीं छूने दे रही थी ... गंजी थी वह और पूरे कपडे लहुलुहान ..... उसे मालूम भी नहीं था कि ये लोग उसके हितेषी है .... सोचती हूँ इस वहशी समाज में वह रात रात को कैसे सड़क में जीती थी होगी ... कितने ही बलात का वह शिकार हुई होगी ... उसका बच्चा और वह अब किसी ऐसी ही जगह सहारा पाए होंगे ... वह ४ साल की लड़की भी याद आई जिसको बलात्कारियों ने सड़क पर छोड़ दिया था और वह माँ पिता की तलाश में देहरादून लायी गयी थी .... पर वह शायद कुछ भी सही नहीं बता पा रही थी और अनाथ हो चुकी थी ...

पर जिस एक बात की मुझे ख़ुशी हुई वह थी कि कुछ लडकियां वहां से स्कूल पढने जाती है .................. लेकिन वे घर आ कर कैसे पढ़ती होंगी .... जहाँ बार बार चीखते लोग ....... चीजें पटकते आपस में लड़ते या रोते हुए लोग है ... 

         मेरा व्यक्तिगत सोचना है कि हम ऐसी महिलाओं के लिए संस्थागत  मनोवैज्ञानिक  इलाज, काउंसलिंग करें, घर वालों को उनसे मिलने के लिए उत्साहित करें और उनको मिलवायें, इसके अलावा उनको आउटिंग करवाएं ताकि उनका भी एक बड़ा आसमान हो ..... उनकी ऊर्जा को किसी सकारात्मक कार्यों में लगवाएं ताकि वह भी समाज के लिए योगदान दे कर अपने होने को सार्थक समझ सकें .... साथ ही हमें दिवाली या शादी ब्याह या जन्मदिन और उत्सवों के खर्चों में से फिजूलखर्ची को बचा कर मिलजुल कर ऐसे लोगो के लिए मिलजुल कुछ  नेक कार्य करना चाहिए ......
( सेंसर कर के लिखा गया )

                                       

Tuesday, February 4, 2014

उसके साथ मुस्कुराता है बसंत



उसने देखी थी
तस्वीर
अपनी ही सखी की
जिसमे स्त्री हो जाती है जंगली
जिसके तन पर उग आती है पत्तियाँ
बलखाती बेलें अनावृत सी
कुछ टीले टापू और ढलानें
और
जंगल के बीच अलमस्त बैठी वह स्त्री  
सारा जंगल समेटे हुए
प्रशंसक हैं कि टकटकी बाँध घेरे हुए तस्वीर को  
और चितेरे अपने मन के रंग भरते हुए ..........

तब धिक्कारती है वह अपने भीतर की स्त्री को
कि जिसने
देह के सजीले पुष्प और महक को
छुपा कर रखा बरसों 
किसी तहखाने में जन्मों से
कितने ही मौसमों तक 
और तंग आ चुकती है वह तब 
दुनिया भर के आवरण और लाग लपेटों से.................

वह कुत्ते की दुम को सीधा करना चाहती है
ठीक वैसे ही जैसे वह चाहती है जंगली हो जाना
लेकिन उसके भीतर का जंगल जिधर खुलता है
उधर बहती है एक नदी संस्कारों की
जिसके पानी के ऊपर हरहरा रहा है बेमौसमी जंगल  
और वह देखती है एक मछली में खुद को 
जो तैर रही है पानी में.....................  
वह कुढती है खुद से
वह उठाती है कलम
और कागज में खींचना चाहती है एक जंगल बेतरतीब
पर शब्द हैं उसके कि जंगली हो नहीं पाते
ईमानदारी से जानने लगी है वह 
जंगली होना कितना कठिन है  
असंभव ही नहीं उसके लिए नामुमकिन है
वह छटपटाती है 
हाथ पैर मारती है 
वह मन के विषम जंगल से बाहर निकल पड़ती है ......
....................................................................................
और जिधर से गुजरती है वह
उसके मन के जंगल से गिर जाता है 
सहज हरा धरती पर 
प्रकृति खिल उठती है   
हरियाली लहलहाने लगती है 
प्युली खिल उठती है पहाड़ों में
कोयल गीत गाती है 
और बसंत मुस्कुराता है ................................ ~nutan~

***********************************************
बसंतपंचमी पर शुभकामनाएं 

Wednesday, January 15, 2014

बर्फ के खिलाफ जारी है उसका विद्रोह

वो
सामने एक बर्फ का ढेला
औंधी पडी कुल्फी सा  
प्लेट पर ...
कि जिसको चाहा था राजिया ने 
बेसब्री से
और
कि कुछ गर्मी तो हो 
उसके लिए ....
कि छू सके 
सहला सके
प्रेम से हाथों में उठा तो सके  ...
छूने की इस तमाम ख्वाहिश में
ठोस ढेला खो गया
पानी पानी हो गया .............
और हादसे के बाद
जब भी पानी को देखती है राजिया 
तमाम उष्माओं को खो कर
प्रेम में
बर्फ हो जाना चाहती है
ढेले को छूना चाहती है
पोरों पर
और हाथों में हाथ रख कर
हथेलियों की जुम्बिश में खो देना चाहती है

चेतना को  ...........
-------------------------------
पर इसके पलटवार
शहर की गलियों में
राजिया को चुस्की खाते देखा है
लोगों ने
लाल लाल होंठों पर
शायद राजिया दर्ज करती है  विद्रोह 
बर्फ के खिलाफ

गर्मी के खिलाफ ....................

Saturday, January 4, 2014

सीमित परवाज की अबाबील नहीं हो तुम - तुम्हें उड़ना है दूर तक



 

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हाहाहा
प्यार भी किस चिड़िया का नाम है

है ना ..

औचक सी रह जाती हूँ मैं
कंधे पर फुदक कर बैठ जाती है जब
किसी जंगल की खुशबू का आभास लिए
पर्वतों पर आ जाती है वह
चहकती हुई लुभाती हुई
..........

ओ अबाबील तुम प्रवासी हो
पहाड़ का सम्मोहन तुम्हें खींच लाता है इधर
पर
तुम नहीं जानती कि कब बदल जायेंगे ये मौसम
और तुम्हें जाना होगा वापस .....


पहाड़ पर बहते हुए तुम्हारे प्रेम राग
और कन्धों पर तुम्हारे पंखों की फडफडाहट
गुदगुदा जाते है बहुत ..........

.
और देखों उन हाथों में
दोना है अनाज  का
वो तुम्हें चुगाएगी नहीं
बेशक तुम बहुत अच्छी हो अबाबिल ......


फिर भी ध्यान रखना
वो अभिशापित है निष्ठुरता के लिए
तुम पर जारी निष्ठुरता के लिए प्रतिबद्ध है

इसलिए वो खुद के प्रति अन्यायी हो जाती है

और हो जाती है  खुद से निष्ठुर .......
फिर भी
अगर तुम्हें भूखा न वो देख पाए

और स्नेह से बिखरा दे दानें
पर तुम न चुगना दानो को

न उनके फेर में पड़ जाना ........
ये पहाड़ है हिमालय के


जहाँ पाषाण बहुतेरे और हरियाली है कम 

और जाने कब बदल जाए मौसम
आ जाए कोई बर्फीला तूफ़ान
और नन्ही अबाबील हो जाए लुप्त ...
इससे पहले ही तुम
उसके कंधे से उतर जाओ
जाओ परवाज लगाओ .......
पहाड़ से दूर बहुत दूर
क्यूंकि वो भी चाहती है तुम्हारी दीर्घ खुशी
और तुम्हारी उन्मुक्त लंबी उड़ान .......

ये जायज है कि तुम्हारा लक्ष्य
एक कंधे के लिए संकीर्ण हो नहीं सकता

तुम्हें फैलाने होंगे वृहद समाज के लिए अपने पांखें

दूर तक उड़ना होगा  

और सुनाना होगा सबको मधुर राग .….. नूतन





Saturday, December 7, 2013

नेल्सन मंडेला के लिए …




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वो युगक्रांति के नायक ,
चमड़ी से गहरा और रंगों से ऊपर
एक विस्तृत युगविचार ..
पृथ्वी में पृथ्वी से वो ...
वो मिट नहीं सक्ते ..
जी रहे है दुनियाँ के तमाम रंगों के साथ
और जब तक दुनियां में रंग है ..
हर रंग में वो है.......……
ओ मेलिनिन के काले भूरे कणों
तुम सदा तत्पर रहोगे
एक देह की सुरक्षा के लिए
सूरज की जलाने वाली तपिश में

मनुष्य की जरूरत के लिए,
और याद दिलाते रहोगे
कि अभी रंगभेद की आग को बुझाने वाला
एक साधू पैगाम दे गया है
मानवता का प्रेम का .…….नतमस्तक नेल्सन .... ~nutan~

Tuesday, September 10, 2013

पुरानी पाती और लाल ख्वाब


 

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कुछ पुराने पत्र

अलमारी में

गुलाबी झालर वाले

पर्स में,

दो दशक बाद भी

उस कशिश के साथ

गिडगिडाते हुए .....

 

कि देखो मैंने श्याम श्वेत

ठोस उड़ानों को

लाल ख्वाबों के जाल में

फंसने के लिए छोड़ दिया है

जबकि मैं खुद को

परिवर्तित कर रही हूँ

लाल गुलाब में ....

 

मां पिता ने बलाए ली है

कि मैं श्याम श्वेत पथ से

शिखर पर जाने वाले

मार्ग को छोड़ दूँ .....

 

महावर भरे पैरों के निशान

तेरी दहलीज पे उकेर दूँ

और अपने बचपने को त्याग

लाल चुनर की

जिम्मेदारी को ओड लूँ .......

 

ख्वाबों के सतरंगी परिंदे

उनके क़दमों पर रख दिए

मैंने स्वीकार है तुझे

अपनी इच्छाओं की ठसक को छोड़

मैं खुद को लाल रंगों में

रंगने की भरसक कोशिश में

अपने को भुलाती हुई

तेरी ओर आती हुई .......

 

अभी मेरे हाथों में मेहंदी

लगी हुई है

घर के कोनों में हल्दी भरे

हाथो के निशां

और दरवाजे से

घर के अंदर आते हुए लाल महावर के निशां

और एक छत.........

 

और उस छत के नीचे

अजनबी की तरह जीते हुए

घुटनभरे

दो दशक

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शायद तेरे पुरुषत्व ने

कभी माफ नहीं किया उस छोटी लड़की को

जिसने अपनी ऊँची उड़ानों की जिद्द

आखिरकार छोड़ दी थी

और लाल चुनर ओढ़ ली थी ........... ~nutan~


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