Sunday, April 21, 2013

तुम कहाँ हो सीपी



तुम कहाँ हो सीपी …


सागर ने कभी बढ कर
दो बूंद भर कर भी नहीं दिया पानी
वह अपनी जगह लहराता रहा
पानी से भरपूर है यह अहम जरूर भरमाता गया ..
कहता था कि आओ कि डूब जाओ
छोडो उस किनारे को|
या दूर किसी पहाड़ के शिखर पर जाओ, चढते जाओ
रात के सर्द अंधेरों में ग्लेशियरों में जाओ, जा कर जम जाओ|
या रेत में जा कर भरी दोपहर में
मरीचिका के पीछे दौड़ो, अतृप्त प्यास से मर जाओ | ………….
और आंखे हैं कि बेहिसाब सागर को सोखती रही
बस वह घूंट घूंट चुप चुप पीती रही
नमक पानी से रोम रोम भिगोती रहीं
जो तरल मिला नहीं कभी सागर से
दीवारे सैलाब की  फटती रही भीतर से  …
फिर आँखों में  उसकी तलहट से छंट छंट कर 

कहाँ से आता रहा मोती सा |


मोती सा ?
हाँ मोती सा …
जो अभिव्यक्त होने में सदा शेष रहा
फिर भी व्यक्त होने के लिए पुरजोर रहा
सिर्फ तुमसे
हाँ सिर्फ तुमसे
इस तरह जैसे ..
कोई शब्द नहीं
कोई गीत नहीं
आवाज भी थी कोई नहीं|

जो गिरा आँख से
सिर्फ तुमसे था
वह एक बूंद
केन्द्र का बिंदु
प्रेम का निचोड़ 
तुम्हारी झोली में आ गिरा, रे सागर!
जिसमे मन का हँसना रोना मुस्कुराना
प्यार मनुहार सभी कुछ मिला था
भावनाएं सान्द्र अति सान्द्र
बस ठोस नहीं हुई बचा गई अपना तरल 
जिसमें दिल की हर पुकार और घना प्यार निहित/बंधा बेहद सान्द्र|
वह एक बूंद मौन चाँद को इंगित करता रहा
जैसे कहता हो चाँद! बेशक तुम रात के रथ पर
मगन
कभी रोशन कभी धूमिल
कभी आते कभी गुम जाते हो
मुझे नजरअंदाज कर चले जाते हो
फिर भी  
उत्तर दिशा की रात का एक ध्रुव हूँ मैं 
अटल
तुम्हारे न आने, चुपके से चले जाने से
बेशक अंदर से हिल जाता हूँ
फिर भी
बिन हिले 
बिन आशा के
बस अडिग अटूट प्रतीक्षा में !
बेशक प्यार के सीपी में
उस एक बूँद की
मोती बनने को दौड  जारी है
लेकिन बहना उसकी प्रवृति है
ठोस उसकी मृत्यु है
वह मृत्यु को नहीं चुनेगा
पर शास्वत मृत्यु की ओर सतत चलेगा
तुमसे मिलने को …. 

Wednesday, April 10, 2013

हाँ! ये तुम्हीं से हैं|

 

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तुम मेरे

अनछुवे ख्वाब हो

पाकीजा|

जैसे किसी बच्चे की झोली में आ गिरे

एक डॉलर हो

बेहद अनमोल,

खर्च करने लायक नहीं हो जो

सिक्कों की तरह|

तंगहाली में भी

पेट की भूख में भी

रहता है  उसकी जेब में बंद

एक रोटी की तरह

एक सूरज की तरह|

तुम मेरी

पलकों में छुपा कर रखे हुए

अदेखे ख्वाब हो

जिसे रोज प्रस्फुटित होते देखती हूं खुद के भीतर |

जैसे एक पुरानी  बंद

बेशकीमती इत्र की शीशी में

सुकूने जिंदगी की खुश्बू

जो खुलती नहीं है बाहर

सदा महकती रहती है

‘साँसों के साथ

मन के भीतर|

ख्वाब पूरा होने के लिए नहीं

कि फिर एक नया ख्वाब ले जन्म

तुम्हारा अधूरापन ही बेहतर है|

इससे पहले की नींद पूरी हो

और ख्वाब टूट जाए

नहीं नहीं

मैं तुम्हें बसने नहीं दूंगी पलकों पे

पूर्ण हो कर तुम्हें लुप्त भी न होने दूंगी,

तुम शेष रहोगे हमेशा

अशेष संभावनाओं के साथ

सदा रहोगे विशेष

बन् कर

मेरी आँखों में चमक

मेरी आँखों की नमी |

हाँ ! ये तुम्हीं से हैं |

 

…………………….~nutan~

 

Tuesday, April 2, 2013

एक मदद मिलेगी ?

प्रिय ब्लॉग मित्रों! पिछले डेढ़ दो माह से मैं डेशबोर्ड में किसी भी ब्लॉग को नहीं देख पा रही हूँ... जिन्हें मैंने फोलो किया था .. न ही ब्लॉग के इस नए कलेवर को मैं समझ पा रही हूँ .. मैं सभी ब्लॉग पोस्टों को पढ़ने से वंचित हो गयी हूँ ... मैंने इस बीच गूगल प्लस पर क्लिक किया था जहाँ मित्र बनाने के ऑप्सन थे .... मुझे नहीं मालूम की यह गडबडी कहाँ से शुरू हुई और यह कैसे पूर्ववत  ठीक हो... कृपया आप मेरी मदद कर सकेंगे तो मैं ब्लॉग पर आना सार्थक समझ पाऊं ... नहीं तो सिर्फ अपनी पोस्ट को प्रकाशित करने का कोई औचित्य शेष नहीं रहता जबकि हम अन्य ब्लॉग पोस्टिंग को न पढ़ पा रहे हो ... आप सभी का धन्यवाद ...... नूतन 

नदी की खुशियाँ - डॉ नूतन गैरोला



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नदी की खुशियाँ
****************

खुशियाँ जब जब आईं
मैने मुट्ठी भर भर बिखरा दिया चारों तरफ
इस आशा से कि लहलहाएं -
खुशियों की हरियाली चारों दिशाओं में ...
मुस्कुराते रहें चेहरे अपनी उमंगों में
और उनकी मुट्ठी में रहे सलामत खुशियों की सौगात
और उनको मुस्कुराते देख
मेरे भी चेहरे पर निरापद बनी रहे मुस्कान
न रहे अपनी फिक्र - न किसी से पाने की उम्मीद,
मेरे हाथ खाली हैं
और झोली में कुछ भी नहीं है शेष ..
नहीं चाहिए मुझे अब नदी होने का सम्मान
कि बहती रहूँ बिना कुछ मांगे
बूंद बूंद सोख ली जाऊं
किन्हीं अनजान बहारों की खातिर ...
न नदी कहकर देना मुझे भुलावा
कि जो आये और धो जाए अपने हाथ
और मेरे पावन तट को कर जाए पंकिल,
देखो ध्यान से
अब मैं बूँद नहीं उस पानी की
जो ठहर जाऊं किसी पलक के किनारे ...
कि आंसू बन टपक कर गिर जाऊं
अपनी आँखों से असहाय –

आज मत पूछो मुझसे
कि जिन्दगी के हानि-लाभ में
क्या खोया - क्या पाया है मैंने,
बेशक हाथ खाली हैं
और भर आया है मन -

आज मैंने अपनी मुट्ठी बांध ली है बेहिचक।……………. ~ nutan ~

Thursday, March 21, 2013

गौरैया लौट आओ


विश्व गौरैया दिवस २० मार्च २०१३ को मेरी भावना और मेरी खींची हुई तस्वीर
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     “चुनचुन करती आयी चिड़िया दाल का दाना लायी चिड़िया” .. माँ यह गीत गाती तो हम बच्चों की आँखें टुपुर- टूपूर छत और आँगन की ओर निहारने लगती .. फुदकी रहती वो सफ़ेद और भूरी गौरैया छज्जे और मुंडेर में , घर के आँगन में .. दाना डालते तो चुगती, चीं-चीं बातें करती और अचानक किसी हवा के झोंके सी उड़ जाती, दरख्तों पर सुबह सवेरे सांझ को उनकी मन्त्रमुग्ध करने वाली चहक, सुबह का सुरीला गीत, घर के आँगन की एक रौनक ... अलसाई दोपहर में चुलबुलाहट बन उतरती आँगन में और बच्चों की खिलखिलाहट बन जाती .. और छिछले पानी के कोटरों में दिन की धूप में छुडबढ़- छुडबढ़ नहाना, पंख फडफडाना कितना अच्छा लगता था उसे घंटो निहारना फुदकती नाचती लगती थी वह … कभी देखती तिनका तिनका जोड़ती घोसला बनाती और छोटे छोटे अंडे देती, छोटे छोटे बच्चे होते जो बड़े बड़े मुंह खोल चीं चीं करते, और माँ गौरैया और पिता गौरैया खाने की जुगाड कर लाते और उनकी चौंच में चोंच डाल उनकी भूख को शांत करते …यह सिलसिला मैंने कई बरसों देखा . पर अब तो चुनचुन करती आई चिड़िया गाने वाली मेरी प्यारी माँ जाने किस दुनियाँ में जा बसीं और ये पनीली आँखें माँ संग अब इन गौरैया को भी ढूँढती है| मेरा आँगन सूना हो चला है .. मैं गौरैया को पुकारती हूँ और कहती हूँ गौरैया एक पूरी प्रजाति हो तुम किस जहाँ में जा बसने लगी हो... कालातीत नहीं होने देगा तुम्हें आने वाला कल, गौरैया तुम लौट आओ देखो मैंने कुछ पौधों को रोपा है इस उम्मीद में कि कल दरख्तों पे होगा तुम्हारी खुशियों का घर आँगन .. होगी कुछ खुली हवा कुछ हरियाली, इसलिए तुम उन काली आँधियों की फिकर न करना जिन्होंने चिमनियों से उठ कर इस हवा को जहर से भरा है, उन कंक्रीट की फिकर न करना जिसने तेरे आम बरगद, टेसू नीम को नेस्तानाबूत किया है, कुछ चिंता की लकीरें माथे पर बलखाने लगी है इंसा की कि ऐसी आबोहवा में जब अस्तित्व गौरिया का खतरे में पड़ा तो आने वाले कल में काली हवाओं के शिकंजे में हमारी पीडी का क्या होगा, चेत रहा है आदमी, कुछ तो ऐसा करेगा आदमी कि हरितिमा का श्रृंगार करेगी धरती फिर से .. गौरैया तुम लौट आओ ....
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यह गीत आज फिर याद आया ----
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ओ री चिरैया, नन्ही सी चिड़िया |
अंगना में फिर आजा रे ||
ओ री चिरैया, नन्ही सी चिड़िया |
अंगना में फिर आजा रे ||
अँधियारा है घना और लहू से सना, किरणों के तिनके अम्बर से चुन के |
अंगना में फिर आजा रे ||
हमने तुझपे हजारो सितम हैं किये, हमने तुझपे जहां भर के ज़ुल्म किये |
हमने सोचा नहीं, तू जो उड़ जायेगी ||
ये ज़मीं तेरे बिन सूनी रह जायेगी, किसके दम पे सजेगा मेरा अंगना |||
ओ री चिरैया, मेरी चिरैया |
अंगना में फिर आजा रे ||
तेरे पंखो में सारे सितारे जडू, तेरी चुनर ठनक सतरंगी बुनू |
तेरे काजल में मैं काली रैना भरू, तेरी मेहंदी में मैं कच्ची धुप मलू ||
तेरे नैनो सजा दूं नया सपना |||
ओ री चिरैया, मेरी चिरैया |
अंगना में फिर आजा रे ||
ओ री चिरैया, नन्ही सी चिड़िया |
अंगना में फिर आजा रे ||
ओ री चिरैया…..
आज गौरैया दिवस पर अपनी खींची यह गौरैया तस्वीर - मेरा क्लिक

Wednesday, March 20, 2013

कविता और प्यार



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मैंने तुम्हें
पन्नों पन्नों में ढूँढा है
जहाँ कही भी मिली हो पढ़ा है |
कलम उठाई तो
उकेरा है हर कागज़ में|
जानती हूँ ..
तुम्हारा पन्नों से है गहरा वास्ता
इसलिए मैंने तुम्हें दिल से उतार 
पन्नों में गढा है|
तुम मेरे पन्नों में लिखी इबादत हो
तुम मेरी गुफ्तगू का निज तत्व हो 
मेरे प्यार का मकबरा भी हो तुम
और तुम्हीं मेरे जीने का सबब हो 
तुम मेरी प्यारी कविता हो | ……………. नूतन
लव यू फॉरएवर











Monday, March 18, 2013

मेरे घर में बसंत


 
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मैंने पाया बसंत

घर की दालान से बाहर

आम्र मंजरी बन् पेड़ों पर खिलता रहा

टेसू पर दहकती लालिमा लिए

सरसों बसंत की ओढनी ओढ़े हुए

कुहुक कर बुलाती कोयलिया मुझे

और मैं

दीवारों के भीतर के

पतझड़ को चुनती रही

मौन

डाली से गिरे पत्तों को समेटती रही

आस्था के जल से सीचती रही

कि खिलेगी बहार मेरे घर के भीतर भी

मेरी जिद्द है कि

इन ठूंठ पर भी उग आये हरे कोंपल

मेरी जीत के

या कि हार कर हो जाऊं मैं भी ठूंठ ........……… नूतन ९:४४ रात्री १८ / ३/ २०१३

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