Tuesday, September 10, 2013

पुरानी पाती और लाल ख्वाब


 

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कुछ पुराने पत्र

अलमारी में

गुलाबी झालर वाले

पर्स में,

दो दशक बाद भी

उस कशिश के साथ

गिडगिडाते हुए .....

 

कि देखो मैंने श्याम श्वेत

ठोस उड़ानों को

लाल ख्वाबों के जाल में

फंसने के लिए छोड़ दिया है

जबकि मैं खुद को

परिवर्तित कर रही हूँ

लाल गुलाब में ....

 

मां पिता ने बलाए ली है

कि मैं श्याम श्वेत पथ से

शिखर पर जाने वाले

मार्ग को छोड़ दूँ .....

 

महावर भरे पैरों के निशान

तेरी दहलीज पे उकेर दूँ

और अपने बचपने को त्याग

लाल चुनर की

जिम्मेदारी को ओड लूँ .......

 

ख्वाबों के सतरंगी परिंदे

उनके क़दमों पर रख दिए

मैंने स्वीकार है तुझे

अपनी इच्छाओं की ठसक को छोड़

मैं खुद को लाल रंगों में

रंगने की भरसक कोशिश में

अपने को भुलाती हुई

तेरी ओर आती हुई .......

 

अभी मेरे हाथों में मेहंदी

लगी हुई है

घर के कोनों में हल्दी भरे

हाथो के निशां

और दरवाजे से

घर के अंदर आते हुए लाल महावर के निशां

और एक छत.........

 

और उस छत के नीचे

अजनबी की तरह जीते हुए

घुटनभरे

दो दशक

---------------------------------------------

शायद तेरे पुरुषत्व ने

कभी माफ नहीं किया उस छोटी लड़की को

जिसने अपनी ऊँची उड़ानों की जिद्द

आखिरकार छोड़ दी थी

और लाल चुनर ओढ़ ली थी ........... ~nutan~


9 comments:

  1. वाह....
    बहुत बढ़िया....बेहद अर्थपूर्ण!!!

    अनु

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  2. सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि का लिंक आज बुधवार (11-09-2013) को हम बेटी के बाप, हमेशा रहते चिंतित- : चर्चा मंच 1365- में "मयंक का कोना" पर भी है!
    सादर...!
    आप सबको गणेशोत्सव की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. सुन्दर अभिव्यक्ति ....शानदार..

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  4. गहन भाव लिए सुन्दर रचना..नूतन जी

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  5. भावो को खुबसूरत शब्द दिए है अपने.....

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  6. अत्यन्त सशक्त अभिव्यक्ति

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