Saturday, December 7, 2013

नेल्सन मंडेला के लिए …




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वो युगक्रांति के नायक ,
चमड़ी से गहरा और रंगों से ऊपर
एक विस्तृत युगविचार ..
पृथ्वी में पृथ्वी से वो ...
वो मिट नहीं सक्ते ..
जी रहे है दुनियाँ के तमाम रंगों के साथ
और जब तक दुनियां में रंग है ..
हर रंग में वो है.......……
ओ मेलिनिन के काले भूरे कणों
तुम सदा तत्पर रहोगे
एक देह की सुरक्षा के लिए
सूरज की जलाने वाली तपिश में

मनुष्य की जरूरत के लिए,
और याद दिलाते रहोगे
कि अभी रंगभेद की आग को बुझाने वाला
एक साधू पैगाम दे गया है
मानवता का प्रेम का .…….नतमस्तक नेल्सन .... ~nutan~

Tuesday, September 10, 2013

पुरानी पाती और लाल ख्वाब


 

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कुछ पुराने पत्र

अलमारी में

गुलाबी झालर वाले

पर्स में,

दो दशक बाद भी

उस कशिश के साथ

गिडगिडाते हुए .....

 

कि देखो मैंने श्याम श्वेत

ठोस उड़ानों को

लाल ख्वाबों के जाल में

फंसने के लिए छोड़ दिया है

जबकि मैं खुद को

परिवर्तित कर रही हूँ

लाल गुलाब में ....

 

मां पिता ने बलाए ली है

कि मैं श्याम श्वेत पथ से

शिखर पर जाने वाले

मार्ग को छोड़ दूँ .....

 

महावर भरे पैरों के निशान

तेरी दहलीज पे उकेर दूँ

और अपने बचपने को त्याग

लाल चुनर की

जिम्मेदारी को ओड लूँ .......

 

ख्वाबों के सतरंगी परिंदे

उनके क़दमों पर रख दिए

मैंने स्वीकार है तुझे

अपनी इच्छाओं की ठसक को छोड़

मैं खुद को लाल रंगों में

रंगने की भरसक कोशिश में

अपने को भुलाती हुई

तेरी ओर आती हुई .......

 

अभी मेरे हाथों में मेहंदी

लगी हुई है

घर के कोनों में हल्दी भरे

हाथो के निशां

और दरवाजे से

घर के अंदर आते हुए लाल महावर के निशां

और एक छत.........

 

और उस छत के नीचे

अजनबी की तरह जीते हुए

घुटनभरे

दो दशक

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शायद तेरे पुरुषत्व ने

कभी माफ नहीं किया उस छोटी लड़की को

जिसने अपनी ऊँची उड़ानों की जिद्द

आखिरकार छोड़ दी थी

और लाल चुनर ओढ़ ली थी ........... ~nutan~


Saturday, August 31, 2013

अँधेरे के वे लोग



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अँधेरे में छिपे वे लोग कभी दिखते नहीं

दिन के उजालों में भी

अदृश्य वे,

 

सड़क चलते आवारा कुत्ते

डरते है लोग उनसे

दूर से ही दिख जाते है

एक बिस्किट गिरा देते है या

थोड़ा संभल कर निकल जाते है ...

 

वही एक प्राचीर को गढ़ते

एक भव्य महल को रचते

एक बहुमंजिली ईमारतों को रंगते

वे लोग

नजर नहीं आते ...

 

उनकी देह की सुरंग में कितना अँधेरा है

एक नदी बहती है जहां

पसीने की

उसी में कही

वो डूब जाते है

अपनी मुकम्मल पहचान के लिए नहीं

अपने निर्वाण के लिए

मिट्टी की खुशबू के साथ ....

 

और रात को

जगमगाती रौशनी में

स्वर्ण आभाओं से सुसज्जित

लोग सम्मान पाते है वहाँ

उसी ईमारत में ....

 

नहीं दिखेगा उस इमारत की

जगमगाती रौशनी में वह कभी

 

कहीं  वह चिमनी में रोशनी के लिए

कुछ बूँद तेल की दरकार करता है

उधार

ब्याज पर

गिडगिडाता है|

…. ~nutan~

Thursday, August 1, 2013

अधूरी स्वीकृति



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अधूरी स्वीकृति
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खिलता क्यों है फूल
टूट जाने के लिए
पंखुड़ी पंखुड़ी
बिखर जाने के लिए
रह जाते है शेष
कुछ कांटे कुछ ठूंठ
एक विराम की तरह|
कि जिससे पहले की गाथा
एक कोमल युग की कहानी थी
और जिसके बाद ..................... |
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कभी जान पाया है कोई कि उस पुष्प की अभिलाषा क्या थी ?
हर फूल की अपनी अपनी एक कहानी
कोई दलदल का कमल, तो कोई रात की रानी
कोई प्युली तो कोई बुरांस
कोई गुलमोहर तो कोई पलास
कोई चंपा कोई कचनार
कोई गेंदा तो कोई गुलाब ...........
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तुम किस किस को बूझोगे किस किस को सुनोगे?
यह प्रश्न तो मेरे लिए है, तुम्हारे लिए एक सहज उत्तर ..
फिर भी साथ बने रहने के लिए
सुनो! उस सूखी बावड़ी के किनारे
जहाँ कोमल इच्छाएं करती हैं आत्महत्या
हम एक बागीचा लगा देते है सभी कोमल फूलों का
कि तुम हाथ में लिए रहो उनका लेखा जोखा
थोड़ी काली मिट्टी और बुरबुरी खाद
फिर बैठ कर साथ उन फूलों के रंगों पे गीत गायेंगे
बाटेंगे उनका सुख दुःख
उन्हें गले लगा अपनाएंगे
अपने मन में उठे कोलाहल को दबाये
पूर्ण स्वीकृति के साथ
हम बावड़ी के किनारे खिलते फूलों के साथ
अपने पलों को मह्कायेंगे|
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शर्त इतनी है मेरी
कि मुझमें फिर कभी मत ढूंढना
विराम से पहले का
वह कोमल गुलाब|
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निगोड़ी तेरी नौकरी भी न सौतन, दुश्मन ... ~nutan~

—

Friday, July 26, 2013

फिर कहीं किसी रोज

 

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कभी जाती थी आ जाने के लिए तो कभी आती हूँ जाने के लिए ... यही तो जीवन है .. जिंदगी की रवायत है, रवानगी इसी में है ... छिपी है जिसमें आने की ख़ुशी तो जाने का गम भी है ... बेसाख्ता मुस्कुरा जाओ गर मेरे आने पर कभी तुम तो हिज्र की खलिश को भी सहने का दम भरना, ....मेरी रुखसती की इक स्याह रात को सह लेना इस कदर तुम .. कि न माथे पर शिकन लाना न आँखों में हो नमी .. . अब्र के घूँघट में मुस्कुराएगा महताब किसी रोज फूटेगी चाँदनी झिलमिल बरस बरस और आफ़ताब खिल उठेगा ले कर इक नयी सुबह . मुस्कुराएंगे गुल नए, कि महकेगी कली कली .. वक्त अपने दामन में ले आएगा खुशिया नयी नयी ........ मेरे जाने का गम न करना मैं आउंगी फिर कहीं किसी रोज ...
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और कानों में इक गीत लिखते लिखते बजने लगे ... रहे ना रहे हम महका करेंगे बन के कली, बन के सबा, बाग-ए-वफ़ा में  ~nutan~

Tuesday, July 16, 2013

समुन्दर किनारे, एक अनजाना


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नारियल के पेड़ के नीचे

समुद्री रेत पर

घोंघों संग

बीन रही थी कुछ शंख आकार

और कभी कभी ले लेती थी कोई क्लिक

जब  

सूरज की रौशनी मे

सागर सी अथाह भारी आवाज में

वह मछुवारा बोला

न खींचो तस्वीर मेरी

आपकी सभी तस्वीरें काली पड़ जाएंगी|……..

हँस पड़ी थी मैं पर कुछ न बोला

बस मुश्किल से दो पल, चार कदम चले थे साथ

और तेज क़दमों से मैंने रुख बदल लिया था  

दूर दूर मीलों दूर

पहाड़ों की ओर अपने गाँव को……

वर्षों पहले 

छोड़ आई थी सब कुछ उस तट पर

उस अजनबी काले आदमी को, वो नारियल के पेड़

वो रेत वो समुद्र, नाविक और नौकाएं ……

पर साथ आ गयी थी मेरे, अनजाने में ही

उन सब चीजों की यादें और एक निश्छल हँसी

किन्तु एक ऐसी टीस

जिसने चुपके से

इन सबके बीच

अपनी जगह बना ली थी

जी रही है मेरे भीतर  .................

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मानवीय भावनाएं चमड़ी के रंग से कहीं ऊपर होती है|  ---- ~nutan~


 

Wednesday, July 10, 2013

खुद से दूर - डॉ नूतन गैरोला


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तुम यकीन नहीं करोगे

सच

मेरी दौड है

खुद से

मैं खुद से जीत जाना चाहती हूँ

मैं यकीनन अपनी पहचान बचाना चाहती हूँ

तुम हो कि मेरे खुद में अतिक्रमण

कर चुके हो

व्याप्त हो चुके हो मुझमे

जैसे कोई दैत्य किसी देह में

आत्मा को जकड कर ………

पर

अभी चेतन्य है मन

और उसे मेरा यह खुद का रूप ग्राह्य भी नहीं

इसलिए वह दौड पड़ा है खुद से दूर

जैसे खुशियों से लिपटना चाहता हो पर

भाग रहा हो दुखों की ओर

और वह नदी

जो बलखाती तुम्हारे गाँव की ओर जा रही है

नहीं चाहती है पलट जाना

मुहाने की ओर

पर देखो

उसकी अविरल धार

रुकते रुकते सूख चुकी

क्यूंकि किसी ने भी नहीं चाहां

नदी का रुख मुड़े

तुम्हारे गाँव की ओर ……..

और

उसे बांधा गया है

बांधों में

पहाड़ी की दुसरी छोर|

जानती हूँ

अगर तुम नदी से मिलने आओगे

तो तोड़ दिए जायेंगे किनारे

दीवारे

सैलाबों मे ढाल दी जायेगी

नदी,

नदी नहीं रहेगी 

मिटा दी जायेगी|

……………………………………~nutan~  10 july 2013 .. 15:01

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