Saturday, January 19, 2013

हवा और पानी, दोस्ती अनजानी, एक कहानी


   alonegirlocean-f7237054f369aca58041b635c3bfa3d2_h


दो दोस्त हवा और पानी .. बिछड़ गए , दूर हो गए  .. सिर्फ एक तड़पते अहसास की तरह बस गए मन में इक दूजे के  .. अहसास भी क्या है लहरों से आते जाते हैं .. जब तक पानी और हवा है, लहरें भी हैं .. हवा का पानी संग खेलना, पानी का हवा से टकराना .. भाता था उन्हें और खुशियों की लहरें तरंगित हो जाती चारो तरफ .. ये बार बार हवा का खेलना, पानी का मचलना तरंगो का उठना कुछ तो था उनके बीच जो उन्हें बांधे रहता था … लेकिन आज पानी अपनी ढलान में बहता गया, सैलाब की तरह और हवा आसमा में उठते गई… उनके बीच जो बंधन था विश्वास का चरमरा गया था .. कहीं से नदियाँ उफनती उस सरल पानी के तालाब पर जा गिरी थी ..  सतह पर हवा तालाब के पानी से शिकायत करने लगी क्यूँ तुम ढलान पर बहती नदियों में समा गए हो … पर पानी बिफर गया अपमानित समझ  ..तोड़ कर बाँध बह चला और नीची ढलानों में .. हवा उठती गयी आसमानों में … पर ये क्या आसमान से पानी बहुत बरसा आज ..शायद इस विदाई पर हवा रो पड़ी, और शायद पानी ने चुपचाप अपना अंश हवा को दे दिया था और ये भी कि हवा ने दुवाएं देते हुए अपने अन्दर निहित ख़ुशी का पानी, निचोड़ दिया धरती पर - जा जब तक  धरती है, धरती पर पानी  है, तू भी है मैं भी हूँ और हमारी दोस्ती भी ..  चाहे दूर हो या पास .. अंतर्मन से सदा पास .. इसलिए आज भी लहरें खिलखिलाती हैं पानी पर …  जिंदगी की फसलें लहराती हैं धरती पर .. क्यूंकि जितना सार्थक जीवन है उतना ही है हवा पानी का साथ …. .
……………… nutan ~~

12 comments:

  1. हवा जब पानी को छूती है एक सिहरन सी उठती है..पानी की सतह पर..

    ReplyDelete
  2. बहुत खूब ... जब दोनों में एक ही अंश है तो ये जुदाई आसान नहीं होगी ....

    ReplyDelete
  3. हवा-पानी का सम्‍बन्‍ध बेजोड़ है....यह दर्शन प्रेम की अनोखी आधारशिला है।

    ReplyDelete
  4. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    आपकी पोस्ट के लिंक की चर्चा कल रविवार (20-01-2013) के चर्चा मंच-1130 (आप भी रस्मी टिप्पणी करते हैं...!) पर भी होगी!
    सूचनार्थ... सादर!

    ReplyDelete
  5. सुन्दर दर्शन

    ReplyDelete
  6. मान अपमान , आशाएं निराशाएं ...अटूट रिश्ता है !
    शुभकामनाएं !

    ReplyDelete
  7. अटूट रिश्ता ही दोस्ती है ......

    ReplyDelete
  8. Natural elements and its nature: not very different from our nature, if we pause and contemplate we are the wind, we are the water!

    ReplyDelete

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails